जम्मू-कश्मीर के कश्मीर के इलाके का जीवन पूरे 40 दिन ठहर सा जाता है। चिल्लई कलां से सांसों को छोड़कर जरूरत की सारी चीजें जम जाती है। कश्मीर का पानी का श्रोत डल झील से लेकर जमीन तक पर 1-1 फिट की ऊंचाई तक बर्फ की चादर बिछ जाती है। इससे दुनिया का कौन कौन सा क्षेत्र प्रभावित होता है, सब आपको बताएंगे।
कश्मीर में सर्दियों के 40 दिन चिल्लई कलां जो कि एक फारसी शब्द है, के कारण बड़ी भारी सर्दी पड़ती है। यह कश्मीर की सबसे भीषण और ठंडी अवधि कही जाती है, जो कि आमतौर पर 21 दिसंबर से शुरू होकर 30-31 जनवरी तक लगभग 40 दिनों का होता है। इस दौरान भारी बर्फबारी होती है और तापमान शून्य से काफी नीचे चला जाता है। जिससे डल झील और नदियां तक जम जाती हैं। कश्मीर में यह ‘बड़ी सर्दी’ का समय होता है।
इसे 3 श्रेणियों में बांटा गया है। पहली श्रेणी लगभग 15 दिनों की होती है। इसमें कड़ाके की ठंड, शीतलहर, और भारी बर्फबारी होती है। हर तरफ बर्फ की मोटी मोटी चादर बिछी दिखाई देती हैं। पानी की पाइप से लेकर तालाब तक जम जाती हैं, कश्मीर घाटी पूरी तरह बर्फ से ढक जाता है। इसके बाद की अवधि में 20 दिनों का चिल्लई खुर्द (छोटी सर्दी) और फिर 10 दिनों का चिल्लई बच्चा (बेबी कोल्ड) होता है।
दरअसल इस ठंडी का अपना महत्व भी है। यह ठंडी कश्मीर की नदियों, झरनों और झीलों के लिए पानी का मुख्य स्रोत है, जो गर्मियों में इन जल स्रोतों को फिर से भर देता है। इस दौरान लोग फेरन पहनते हैं जो कश्मीर का पारंपरिक “ऊनी वस्त्र” हैं। चिल्लई कलां जैसी परिस्थितियाँ भारत के हिमालयी क्षेत्र लद्दाख, हिमाचल प्रदेश के लाहौल-स्पीति, उत्तराखंड जैसे उत्तरी भाग में भी देखने को मिलता है।
विश्व में चिल्लई कलां जैसी परिस्थिति ऐसी परिस्थिति दुनिया के साइबेरिया, कनाडा, रूस के कुछ हिस्से, स्कैंडिनेवियाई देश (नॉर्वे, स्वीडन, फिनलैंड) और उत्तरी चीन, जैसी पहाड़ी और उत्तरी क्षेत्रों में होती हैं। यहां सर्दियों में तापमान बहुत नीचे गिर जाता है और कड़ाके की ठंड, भारी बर्फबारी और जमाने वाला तापमान होता है।
किस वजह से होता है
पश्चिमी विक्षोभ का प्रभाव: भारत में कश्मीर सहित उत्तरी भारत के पहाड़ी इलाकों में ठंड और बर्फबारी के लिए पश्चिमी विक्षोभ (Western Disturbances) जिम्मेदार होते हैं, जो भूमध्य सागर से आते हैं।
