विज्ञान व्रत, गरिमा सक्सेना और ज्वालासांध्य पुष्प को मिला ‘डॉ. शांति कुमारी सम्मान’

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मुजफ्फरपुर में सजा साहित्य का भव्य उत्सव, देशभर के रचनाकारों ने शब्दों से बांधा समां

ये माना शहर का ज़रा-सा असर है, मगर फिर भी बेहतर मेरा गांव-घर है..डॉ अविनाश भारती

मुजफ्फरपुर: साहित्य, संवेदना और सृजन की गरिमामयी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए शुक्रवार को जीरो माइल स्थित डॉ. शांति कुमारी सेवा संस्थान सभागार में डॉ. शांति कुमारी सम्मान समारोह का भव्य आयोजन किया गया। शिक्षाविद् एवं राष्ट्रपति शिक्षक पुरस्कार से सम्मानित दिवंगत साहित्यकार डॉ. शांति कुमारी की स्मृति में आयोजित इस समारोह में देश के तीन प्रतिष्ठित साहित्यकारों को उनके विशिष्ट साहित्यिक योगदान के लिए सम्मानित किया गया।

चढ़ तो गये हैं उम्र की ऊंची पहाड़ियां, खतरा-सा लग रहा है मगर अब ढलान पर,..दिनेश प्रभात

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ग़ज़ल विधा में उत्कृष्ट सृजन के लिए नोएडा के विज्ञान व्रत, गीत साहित्य के लिए बेंगलुरु की गरिमा सक्सेना तथा बज्जिका भाषा के संवर्धन में उल्लेखनीय योगदान के लिए समस्तीपुर के ज्वालासांध्य पुष्प को डॉ. शांति कुमारी सम्मान से अलंकृत किया गया। सम्मानस्वरूप प्रत्येक साहित्यकार को ₹5100 की सम्मान राशि, शॉल, प्रशस्ति-पत्र, मोमेंटो एवं यात्रा-भत्ता प्रदान किया गया। सम्मान संस्थान की सचिव डॉ. भावना एवं डॉ. अनिल कुमार ने प्रदान किया।

क्यों अंधेरी घाटियों में घूमते हो मन,
तम प्रभाती गा रहा तुम ऊंघते हो मन: डॉ हरिनारायण सिंह हरि

कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। स्वागत भाषण में डॉ. भावना ने डॉ. शांति कुमारी के साहित्यिक अवदान और शिक्षण जीवन पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनकी जयंती पर पिछले पाँच वर्षों से यह सम्मान समारोह आयोजित किया जा रहा है, ताकि नई पीढ़ी साहित्यिक मूल्यों और रचनात्मक चेतना से जुड़ सके। इस अवसर पर वृत्तचित्र के माध्यम से डॉ. शांति कुमारी के जीवन और साहित्यिक यात्रा का भी प्रदर्शन किया गया।

कभी रंगीन परदों से, कभी दिलकश नज़ारों से, हमारा सच छुपाया जा रहा है इश्तिहारों से..गरिमा सक्सेना

समारोह में दिल्ली, भोपाल, बेंगलुरु, कोलकाता, पटना, झारखंड, गया, छपरा, मुंगेर सहित देश के विभिन्न राज्यों से आए एक दर्जन से अधिक साहित्यकारों ने सहभागिता की। सभी ने साहित्य, समाज और भाषा के बदलते स्वरूप पर अपने विचार व्यक्त किए।

बाज भले अपने डैनों पर इतराये, चिड़ियों की भी अपनी दावेदारी है..डॉ भावना

पुस्तक लोकार्पण बना समारोह का विशेष आकर्षण
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में डॉ. भावना की दो चर्चित पुस्तकों ‘हिंदी ग़ज़ल का युगबोध’ तथा ‘हिंदी ग़ज़ल में स्त्री स्वर’, गरिमा सक्सेना की ‘हिंदी ग़ज़ल’, विज्ञान व्रत के ‘ग़ज़ल समग्र’ तथा दिनेश प्रभात की ‘गीत गागर’ पत्रिका का लोकार्पण किया गया। साहित्यकारों ने इन कृतियों पर गंभीर विमर्श करते हुए समकालीन हिंदी साहित्य की दिशा और संभावनाओं पर चर्चा की।

नर्म लहजे में जरूरी बात का तेवर रखूं, नीर आंखों में भले हो आग भी अंदर रखूं.. डॉ कविता विकास

कवि सम्मेलन में गूंजे संवेदना और समय के स्वर
तीसरे सत्र में आयोजित कवि सम्मेलन ने पूरे आयोजन को भावनात्मक ऊँचाई प्रदान की। विज्ञान व्रत, अनिरुद्ध सिन्हा, दिनेश प्रभात, डॉ. अमर पंकज, डॉ. कविता विकास, डॉ. भावना, गरिमा सक्सेना, डॉ. हरिनारायण सिंह हरि, डॉ. अविनाश भारती सहित देशभर से आए कवियों ने अपनी ग़ज़लों और कविताओं का पाठ किया। प्रेम, समाज, राजनीति, मानवीय संवेदना और बदलते समय की पीड़ा को स्वर देती रचनाओं पर श्रोताओं ने तालियों की गूंज से साहित्यकारों का उत्साहवर्धन किया।

आदमी बिखरता है इश्क़ की कहानी में, रोज-रोज मरता है इश्क की कहानी है,..विकास

समारोह का संचालन राहुल शिवाय ने किया, जबकि कवि सम्मेलन की अध्यक्षता डॉ. कविता विकास तथा संचालन गोपाल फलक ने किया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में साहित्यप्रेमी, बुद्धिजीवी और शहर के रचनाकार उपस्थित रहे। यह आयोजन केवल सम्मान समारोह नहीं, बल्कि हिंदी साहित्य, ग़ज़ल, गीत और क्षेत्रीय भाषाओं के संरक्षण एवं संवर्धन का जीवंत उत्सव बनकर उभरा।

Sandeepak Kumar
Author: Sandeepak Kumar

संदीपक कुमार, पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 साल से अधिक का अनुभव। ई टीवी से कैरियर की शुरुआत की। महुआ, कशिश न्यूज़,न्यूज 29 जैसे चैनल में बतौर पैनल प्रोड्यूसर और पीसीआर हेड के तौर पर काम किया। रायपुर आईबीसी 24, चंडीगढ़ न्यूज 18 में सीनियर प्रोड्यूसर कार्यरत रहे। कंटेंट डिजायनर के साथ ही स्क्रिप्ट राइटिंग, पैनलिंग और डिजिटल में कार्य का भी अनुभव रहा है।

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