अमेरिका और इजराइल ने एक साथ ईरान पर आक्रमण किया है। इसमें इन तीनों के बीच युद्ध का कारण क्या है और क्यों सऊदी इस युद्ध में अमेरिका का साथ दे रहा है। आज हम वह आपको बता रहे हैं कि किस स्वार्थ और लालच ने इस युद्ध की पृष्ठभूमि तैयार की।
इस युद्ध के दौरान अब तक सैकड़ों जाने जा चुकी है। जान माला का काफी नुकसान हुआ है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली ख़ामेनेई की मौत उनके दफ्तर पर दागे गए अमेरिकी मिसाइलों से हुई है। इसके बाद ईरान और आक्रामक हो गया गया और उसने 6 उन देशों पर भी आक्रमण किया जहां अमेरिका ने अपने सैन्य ठिकाने बनाये हुए हैं।
अब इस युद्ध की पृष्ठभूमि को समझते हैं कि इस युद्ध के पीछे की मुख्य वजह क्या है और सऊदी भी क्यूं अमेरिका का बैक डोर से साथ दे रहा है। दरअसल इजरायल और सऊदी दोनों दोस्त तो नहीं है लेकिन दुश्मन भी नहीं है लेकिन इन दोनों का बड़ा दुश्मन ईरान है।
ईरान और और इजराइल के बीच का मामला क्या है वो समझिए। इजराइल का सबसे बड़ा दुश्मन हिजबुल्लाह, हमास और हुती हैं और ईरान इन तीनों का समर्थक है। इन तीनों ने इजराइल के नाक में दम कर रखा है। जिसके कारण एन दोनों के बीच में हमेशा ही तनातनी बनी रहती है।
अब सऊदी और ईरान के वो आर्थिक और धार्मिक मसले समझिए जिसके कारण सऊदी अमेरिका का साथ दे रहा है। आर्थिक मसला तल मार्ग को लेकर है। ईरान और सऊदी के बीच विश्व का सबसे बड़ा तेल मार्ग और समुद्री रास्ता है जो पश्चिम और पूर्व को जोड़ती है। इस मार्ग को ईरान अपना कहता है और इसने इसका नाम दिया है पर्शियन सी। ईरान का जो पौराणिक नाम पर्शिया था। यह बहुत ही संकरा रास्ता है जिसकी चौड़ाई 60 किलोमीटर है और 990 किलोमीटर लंबी है। होर्मुज की जलडमरूमध्य सबसे अधिक संकरी 60 किलोमीटर की है। जबकि सऊदी इस रास्ते को अपने क्षेत्र में का बताता है और इसका नाम उसने अरेबियन सी दिया है। दूसरा धार्मिक कारण यह है कि ईरान शिया मुसलमानों का देश कहा जाता है वही सऊदी सुन्नी मुसलमानों का देश माना जाता है। तो यहां यह लड़ाई धर्म की लड़ाई बन गई है।
अमेरिका का ईरान पर हमले का कारण अमेरिका कहता है कि जहां भी ह्यूमन राइट्स का उल्लंघन होगा वहां वह हस्तक्षेप करेगा। जबकि ईरान पर हमलें की वजह आर्थिक है। ईरान एक तेल उत्पादक देश है। साथ ही सबसे बड़ा तेल मार्ग भी ईरान और सऊदी के बीच ही है। जो कमाई का बहुत बड़ा साधन है। ईरान का परमाणु कार्यक्रम एक प्रमुख मुद्दा बना हुआ है। अमेरिका यूरेनियम संवर्धन पर पूर्ण प्रतिबंध की मांग करता है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका कार्यक्रम शांतिपूर्ण है, हालांकि उस पर 60 प्रतिशत तक यूरेनियम संवर्धन का आरोप है। जिनेवा की अप्रत्यक्ष वार्ता विफल रही, क्योंकि वाशिंगटन ने ईरान के मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रॉक्सी नेटवर्क को भी वार्ता में शामिल करने का प्रयास किया
अमेरिका की दोस्ती इजराइल और सऊदी दोनों से है। साथ ही सी रूट पर भी अपना आधिपत्य जमाना चाहता है। वहीं ईरान भी परमाणु सम्पन्न देश बनना चाहता है, जबकि अमेरिका नहीं चाहता है कि ईरान परमाणु सम्पन्न देश बने। साथ ही अमेरिका कहता है कि जिस देश में जनता परेशान होगी तो वहां की जनता की खातिर ह्यूमन राइट्स के लिए अमेरिका लड़ेगा। ठेकेदारी थोड़े न है डींगबाज ट्रंप की। अब देखते हैं आगे यह लड़ाई क्या रूप लेती है। वैसे भारत पर अभी इसका कोई असर नहीं दिखेगा। भारत के पास खपत के लिए तेल रिजर्व है।

