प्रत्येक पीढ़ी का शुरुआती 15 वर्ष शिक्षा के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता। यही पर भविष्य का खूबसूरत और संस्कारी नींव पड़ता है। अतः शिक्षकों और प्रधानाचार्यों को निरंतर नवाचारी एवं ऊर्जावान बने रहना चाहिए। प्रांतीय प्रधानाचार्य सम्मेलन का तीसरा दिन इस तरह के नई सोच और शिक्षा की वैज्ञानिक पद्धति के नाम रहा।

प्रांतीय प्रधानाचार्य सम्मेलन के तीसरे दिन प्रदेश सचिव रामलाल सिंह, पूर्व पूर्णकालिक शिक्षक एवं प्रधानाचार्य मिथिलेश कुमार सिंह, क्षेत्रीय संगठन मंत्री ख्याली राम तथा प्रख्यात शिक्षाविद् राजदेव सिंह और राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद् देशराज शर्मा उपस्थित थे।

राजदेव सिंह ने लोक शिक्षा समिति एवं बिहार की शिक्षा-संस्कृति को समृद्ध बताते हुए अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने हाजीपुर स्थित +2 विद्यालय के शिक्षक-शिक्षिकाओं की भूमिका का उल्लेख करते हुए विद्यालयों में समर्पित शिक्षण पर बल दिया।

विद्या भारती के अखिल भारतीय महामंत्री एवं राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित शिक्षाविद् देशराज शर्मा ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि प्रत्येक पीढ़ी लगभग 15 वर्षों की होती है, अतः शिक्षकों और प्रधानाचार्यों को निरंतर नवाचारी एवं ऊर्जावान बने रहना चाहिए।

शर्मा जी ने बताया कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 1986 की शिक्षा नीति और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा 2005 के अनुभवों को समाहित किया गया है। उन्होंने आग्रह किया कि आगामी एक वर्ष में नीति के विभिन्न पक्षों पर गंभीर चिंतन कर विद्यालय स्तर पर योजनाबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित किया जाए।

प्रधानाचार्य की भूमिका को केंद्रीय बताते हुए उन्होंने कहा कि नेतृत्व में संचार, सहयोग, सामूहिकता और जीवन-कौशल का समावेश होना चाहिए। सुकरात, प्लेटो और अरस्तु के उदाहरणों से उन्होंने स्पष्ट किया कि विद्यालय का वातावरण ही विद्यार्थियों के व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
अंत में देशराज शर्मा ने सभी प्रधानाचार्यों से आह्वान किया कि वे राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को योजनाबद्ध रूप से लागू करें, ताकि वर्ष 2040 तक भारत की शिक्षा व्यवस्था विश्व के लिए आदर्श बन सकें।

