मुजफ्फरपुर: बज्जिका दिवस पर साहित्यकारों का सम्मान; महाकवि अवधेश्वर अरुण के साहित्यिक योगदान को किया याद

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महाकवि अवधेश्वर अरुण ने लिखी थी बज्जिका में रामायण

मुजफ्फरपुर/खबर जिन्दगी: बज्जिका भाषा एवं साहित्य के संरक्षण एवं संवर्धन को लेकर बुधवार, 14 अक्टूबर 2026 को एक कार्यक्रम का आयोजन किया गया। अरुणादित्य ट्रस्ट एवं तथागत सांस्कृतिक फाउंडेशन के संयुक्त तत्वावधान में बज्जिका दिवस सह 26वें महाकवि अवधेश्वर अरुण बज्जिका सेवी सम्मान समारोह का आयोजन किया गया।

यह आयोजन शहीद प्रमोद बी.एड. कॉलेज, माधोपुर सुस्ता मुजफ्फरपुर के परिसर में किया गया था।  इस कार्यक्रम में साहित्यकारों, कवियों और संस्कृति से जुड़े लोगों ने भाग लिया। समारोह में महाकवि अवधेश्वर अरुण के साहित्यिक योगदान को याद करते हुए बज्जिका भाषा की समृद्ध परंपरा और उसके सांस्कृतिक महत्त्व पर चर्चा की गई।

दीप प्रज्ज्वलन के साथ कार्यक्रम का शुभारंभ

समारोह की शुरुआत दीप प्रज्ज्वलन और अतिथियों के स्वागत के साथ हुई। कुमार आदित्य ने मंगलाचरण प्रस्तुत करने के साथ ट्रस्ट की ओर से चलाए जा रहे अभियान के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। इसके बाद डॉ. यशवंत कुमार ने विषय प्रवेश कराया। कार्यक्रम के प्रथम सत्र का संचालन डॉ. रणवीर कुंवर राजन ने किया, जबकि दूसरे सत्र में कवि सम्मेलन का संचालन सविता राज ने किया।

बज्जिका भाषा के प्रसार पर वक्ताओं ने रखे विचार

बज्जिकांचल विकास पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष देवेंद्र राकेश ने उद्घाटन वक्तव्य में बज्जिका भाषा के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने महाकवि अवधेश्वर अरुण के व्यक्तित्व, कृतित्व और उनके साथ बिताए गए समय से जुड़े अनुभव साझा किए। वक्ताओं ने बज्जिका भाषा को क्षेत्र की लोकसंस्कृति, परंपरा और सामाजिक जीवन से जोड़ते हुए इसके साहित्यिक विकास की आवश्यकता पर बल दिया।

जमीन से जुड़ी थी महाकवि अरुण की रचना

समारोह के मुख्य वक्ता प्रसिद्ध आलोचक डॉ. रामप्रवेश सिंह ने कहा कि साहित्य की जड़ें लोकजीवन में होती हैं और शास्त्र उसके पीछे चलता है। उन्होंने महाकवि अरुण को लोकजीवन का संवेदनशील चित्रकार और सर्जक बताया।

डॉ. सिंह ने बज्जिका रामायण का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें राम का स्वरूप लोकमानस से जुड़ा हुआ है। उन्होंने रामकथा को लोकनायकत्व, आस्था और जनमानस की आकांक्षाओं से जोड़कर महाकवि अरुण के साहित्यिक योगदान को रेखांकित किया।

डॉ. संजय पंकज ने बताया सांस्कृतिक चेतना का वाहक

विशिष्ट अतिथि और वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. संजय पंकज ने स्वयं को महाकवि अवधेश्वर अरुण का मानस पुत्र बताते हुए उनके साहित्यिक और सांस्कृतिक व्यक्तित्व पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि अरुण जी सांस्कृतिक भावधारा और आध्यात्मिक चेतना से जुड़े सामाजिक रचनाकार थे। रामकथा परंपरा में बज्जिका अनुवाद के माध्यम से उनका योगदान उल्लेखनीय रहा है।

वरिष्ठ साहित्यकार ज्वाला सांध्यपुष्प ने महाकवि अरुण को युगांतकारी कवि बताते हुए कहा कि बज्जिका भाषा प्रेम, संस्कृति और लोकभावनाओं की संवाहक रही है।

पूर्वजों को याद करना समाज के लिए प्रेरणादायी

मुख्य अतिथि शहीद प्रमोद डिग्री कॉलेज के प्राचार्य श्याम नंदन कुमार यादव ने आयोजन की सराहना की। उन्होंने कहा कि जो समाज अपने पूर्वजों को स्मरण करता है, वह दूसरों के लिए अनुकरणीय और प्रेरणादायी बनता है।

समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. शारदा चरण ने महाकवि अरुण की कृतियों में साहित्य और शास्त्र के सुंदर समन्वय की चर्चा की। उन्होंने उनके साहित्यिक योगदान को बज्जिका भाषा की विरासत के लिए महत्त्वपूर्ण बताया।

पांच साहित्यकारों को मिला बज्जिका सेवी सम्मान

समारोह में बज्जिका भाषा और साहित्य के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान के लिए पांच साहित्यकारों को महाकवि डॉ. अवधेश्वर अरुण बज्जिका सेवी सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वालों में प्रो. दिनेश कुमार सिंह, डॉ. उषा किरण, हंसलाल साह, सुनील कुमार और प्रो. अमिताभ कुमार सिन्हा शामिल हैं।

सभी सम्मानित साहित्यकारों को अंगवस्त्र, प्रतीक चिह्न और प्रशस्ति पत्र प्रदान किए गए। इस अवसर पर उनके साहित्यिक योगदान की सराहना की गई।

अंतिम सत्र में कवि सम्मेलन का आयोजन

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में भव्य कवि सम्मेलन आयोजित किया गया। इसकी अध्यक्षता उदय नारायण सिंह ने की। कवि सम्मेलन में रविकिशोर चंचल, मणिभूषण अकेला, अवधेश तृषित, पुष्पा गुप्ता, सविता राज, ज्योति सिन्हा, प्रो. दिनेश कुमार, राम किशोर चकवा, दिनेश धुरंधर और सुनील कुमार सहित अनेक कवियों ने अपनी रचनाओं का पाठ किया।

कवियों की प्रस्तुतियों के माध्यम से साहित्यिक और सांस्कृतिक वातावरण जीवंत बना रहा। कार्यक्रम के अंत में अरुणादित्य ट्रस्ट के सचिव कुमार आदित्य ने सभी अतिथियों, साहित्यकारों और उपस्थित प्रबुद्धजनों के प्रति आभार व्यक्त किया।

बज्जिका साहित्य की परंपरा को आगे बढ़ाने पर जोर

बज्जिका दिवस के अवसर पर आयोजित इस समारोह ने क्षेत्रीय भाषा, लोकसंस्कृति और साहित्यिक विरासत के संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया। महाकवि अवधेश्वर अरुण के योगदान को स्मरण करने के साथ साहित्यकारों ने नई पीढ़ी तक बज्जिका भाषा और उसकी रचनात्मक परंपरा को पहुंचाने के महत्त्व पर भी जोर दिया।

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