150 सालों बाद ही सही सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार ‘वंदे मातरम’ को “जन गण मन” के समान दर्जा देने की बात पर विचार कर रही है। यह कदम तब उठाया जा रहा है जब सरकार वंदे मातरम की 150 वीं वर्ष पूरे होने की “सार्धशती” मना रही है। इसका बिहार और मुजफ्फरपुर से भी गहरा नाता है।
इसको लेकर सूत्रों से जो जानकारी मिल रही है उसके अनुसार केंद्र सरकार वंदे मातरम को सम्मान दिलाने के लिए एक औपचारिक प्रोटोकॉल तैयार कर रही है। जिसके अनुसार जन गण मन की तरह ही इसके गायन के वक्त खड़े होकर इसका सम्मान देना है। गृह मंत्रालय द्वारा एक उच्च स्तरीय बैठक में इसके ऊपर विस्तार से चर्चा की गई है।
दरअसल राष्ट्र गीत के गायन के वक्त इसके सम्मान में खड़े होना अनिवार्य है, और अगर कोई ऐसा करता नहीं दिख रहा तो अपमान की शिकायत मिलने पर “राष्ट्रीय सम्मान अपमान निवारण 1971” के तहत सजा दिए जाने का प्रावधान है। लेकिन वंदे मातरम के साथ ऐसा नहीं है। जिसको लेकर बीजेपी ने कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति के तहत इसके महत्व को कम करने का आरोप लगाया है। बीजेपी का कहना है कि 1937 में हुए कांग्रेस अधिवेशन में इसके कुछ अंश को हटा दिया था जिसने देश विभाजन की नींव रखी।
केंद्र सरकार की बैठक में वंदे मातरम के ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए इसे भी राष्ट्रीय गीत की तरह नियम और निर्देश सहित सम्मान के तरीके बनाने पर चर्चा हुई। वंदे मातरम के इतिहास पर नजर डालें तो वंदे मातरम का बिहार और मुजफ्फरपुर से गहरा ऐतिहासिक संबंध रहा है। यह बिहार में अंग्रेजों के खिलाफ राष्ट्रवाद का मुख्य उद्घोष बन गया था। मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस, देश के लिए वंदे मातरम गाते हुए फांसी के फंदे पर झूल गए। पटना में स्थित सात शहीद स्मारक में भी इस गीत की प्रेरणा दिखती है। भारत के पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने वंदे मातरम को ‘जन गण मन’ के समान दर्जा और सम्मान देने की घोषणा की थी।
पिछले कई वर्षों में इसको लेकर अदालतों में कई याचिकाएं दाखिल कर मांग की गई थी कि वंदे मातरम को भी राष्ट्रीय गीत की तरह ही सम्मान और उचित स्थान मिले। संभवतः केंद्र सरकार इन सब को देखते हुए ही कोई निर्णय लेने की परिस्थितियों पर विचार कर रही है।










