मुजफ्फरपुर को विकसित जिले के तौर पर देखने का सपना एक विकसित मानसिकता रखने वाले जॉर्ज फर्नांडिस का था। वे मुजफ्फरपुर को सूती वस्त्र के जरिए दुनिया से जोड़ने चाहते थे। इसके लिए स्वर्गीय जॉर्ज फर्नांडिस ने 1979 में बेला औद्योगिक क्षेत्र की स्थापना की। जिसके शुरुआती सालों में शहर और बाहर के राज्यों के उद्योगपतियों ने दिलचस्पी जरूर दिखाई। लगभग 35 उद्योग लगे थे।
फिर 1990 का साल आया, तब के अनुभवी लोग कहते हैं कि यहीं से समाज की रूप रेखा बदलनी शुरू हुई थी। शहर और गांव का पिछड़ना शुरू हुआ। बिहार के विकास पर ग्रहण लगना शुरू हो चुका था। 1993 आते-आते बिहार के कई कल कारखाने बंद होना शुरू हो गए थे। कई सारे चीनी मिल, बरौनी का खाद कारखाना, मढ़ौरा का चीनी मिल के साथ बिहार का एक मात्र चॉकलेट फैक्ट्री जो मार्टन नाम से प्रसिद्ध था। इसकी स्थापना 1929 में अंग्रेजों द्वारा ही की गई थी और इसका चॉकलेट इंग्लैंड और अमेरिका तक जाता था। 1997 में इसका भी बेड़ा गर्क हो गया।
तब के बड़े बुजुर्ग कहते है कि 1990 से 2000 तक रंगदारी उद्योग का बोलबाला था और जंगलराज सरकार पर हावी थी । उद्योग धंधे बंद हो रहे थे। लोग पलायन को मजबूर हो गए थे। और यही वो समय था जब बेला भी बंदी के कगार पर पहुंच गया और सूती वस्त्र का हब बनते बनते रह गया।
नीतीश के शासनकाल में वर्ष 2010 से स्थिति में थोड़ा सुधार होना शुरू हुआ और 2020 से इस क्षेत्र की सूरत बदलने लगी। इसके बावजूद यह क्षेत्र अब भी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। बिजली, पानी, टूटी सड़के, सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं, स्ट्रीट लाइट तक नहीं है। नालियों से बजबजाता पानी सड़को पर बहते हुए दोनों तरफ के नालों का संगम कराते रहते हैं। टूटी सड़को की तो ये स्थिति है कि बारिश के दिनों में रोड पर चलना मुश्किल होता है। जिससे यह शहर अपने पारंपरिक सूती और ऊनी वस्त्रों के लिए प्रसिद्ध होने के बावजूद एक पूर्ण टेक्सटाइल हब नहीं बन पाया है। इन सब कमियों के कारण अभी भी उद्योगपतियों का रुझान मुजफ्फरपुर की जगह गोरखपुर की तरफ है।










