
उमेश कांत गिरी, ब्यूरो प्रमुख. घाटशिला. झारखंड.
घाटशिला। सोना देवी विश्वविद्यालय, घाटशिला में आयोजित ‘हिंदी पखवाड़ा 2026’ का समापन समारोह-सह-संगोष्ठी स्वामी विवेकानंद सभागार में उत्साह और गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में हिंदी के साहित्यिक एवं सांस्कृतिक महत्व के साथ शिक्षा, प्रशासन, तकनीक, संचार, शोध, कार्यालयीन कार्य और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में हिंदी के बढ़ते प्रयोग और संभावनाओं पर चर्चा की गई।

कार्यक्रम की अध्यक्षता विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने की। इस अवसर पर कुलपति प्रो. डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुआ, कुलसचिव डॉ. नीत नयना, विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष, शिक्षक, शिक्षकेत्तर कर्मचारी, विद्यार्थी, साहित्यकार, शिक्षाविद् तथा अन्य अतिथि उपस्थित रहे।

हिंदी पखवाड़ा के दौरान आयोजित विभिन्न साहित्यिक, शैक्षणिक और रचनात्मक प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को समारोह के दौरान प्रमाण-पत्र देकर सम्मानित किया गया।
मां सरस्वती की वंदना और दीप प्रज्वलन से कार्यक्रम का शुभारंभ
समारोह का शुभारंभ संस्कृत विभाग की सहायक प्राध्यापक कुमारी निकिता के मंच संचालन में मां सरस्वती की वंदना से हुआ। इसके बाद अतिथियों और विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों ने मां सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर पुष्पार्चन किया।

संगीत विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. संगीता चौधरी ने स्वागत गीत प्रस्तुत कर अतिथियों का अभिनंदन किया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि, विशिष्ट अतिथियों और अन्य गणमान्य अतिथियों को विश्वविद्यालय की ओर से अंगवस्त्र, पौधा और श्रीमद्भगवद्गीता भेंट कर सम्मानित किया गया।
हिंदी जीवन और कार्य-संस्कृति का हिस्सा
विश्वविद्यालय की कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने स्वागत भाषण दिया जिसमें हिंदी के व्यवहारिक और व्यापक प्रयोग पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि हिंदी को विषय या साहित्य की भाषा तक सीमित न रखकर जीवन और कार्य-संस्कृति का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि किसी भी भाषा की वास्तविक शक्ति उसके निरंतर और व्यापक प्रयोग में होती है। शिक्षा, प्रशासन, कार्यालयीन कार्य, शोध, तकनीक, संचार और दैनिक व्यवहार में हिंदी का प्रयोग बढ़ने से भाषा को और प्रभावी बनाया जा सकता है।
हिंदी गौरव और सम्मान की भाषा
तुलसी भवन, जमशेदपुर के मानद सचिव डॉ. प्रसंजीत तिवारी ने हिंदी की सामाजिक और सांस्कृतिक भूमिका पर विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की भाषायी विविधता उसकी महत्वपूर्ण पहचान है। नई पीढ़ी को हिंदी की साहित्यिक और सांस्कृतिक परंपरा से जोड़ने तथा भाषा के प्रति सम्मान और गौरव की भावना विकसित करने पर बल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भाषा संस्कृति, परंपरा, स्मृतियों और संवेदनाओं को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम भी है।
हिंदी आत्मीयता, संस्कार और संस्कृति की भाषा : डॉ. विनय कुमार पाण्डे
प्रखर पत्रकार, साहित्यकार और कवि डॉ. विनय कुमार पाण्डे ने हिंदी के महत्व पर विचार व्यक्त करते हुए मैथिलीशरण गुप्त सहित हिंदी साहित्य के प्रमुख रचनाकारों का स्मरण किया। उन्होंने हिंदी को आत्मीयता, संस्कार और संस्कृति की भाषा बताते हुए कहा कि भाषा की उन्नति के साथ राष्ट्र की उन्नति भी जुड़ी हुई है। डॉ. पाण्डे ने अपनी काव्य प्रस्तुतियों के माध्यम से हिंदी को जन-जन तक पहुंचाने का संदेश दिया।
पत्रकारिता और रचनात्मक अभिव्यक्ति में हिंदी की भूमिका पर चर्चा
प्रख्यात पत्रकार, साहित्यकार एवं आशुकवि डॉ. जिवेंद्र कुमार पाण्डेय ने हिंदी साहित्य, पत्रकारिता और रचनात्मक अभिव्यक्ति के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी के हाथों में हिंदी का भविष्य है और युवाओं को भाषा को आधुनिक संदर्भों से जोड़कर आगे बढ़ाने की दिशा में काम करना चाहिए।
आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हिंदी से जोड़ना जरूरी : कुलपति
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुआ ने हिंदी को ज्ञान, संस्कृति, संवेदना और संवाद की सशक्त भाषा बताया। उन्होंने कहा कि हिंदी का विकास महज भाषायी विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह भारतीय ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक चेतना को मजबूत करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण है।
कुलपति ने विद्यार्थियों और शिक्षकों से हिंदी के अधिकाधिक प्रयोग का आह्वान करते हुए इसे आधुनिक तकनीक, शिक्षा, शोध और नवाचार से जोड़ने पर जोर दिया।
हिंदी भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना की महत्वपूर्ण कड़ी : कुलाधिपति
कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए विश्वविद्यालय के कुलाधिपति प्रभाकर सिंह ने हिंदी को भारतीय संस्कृति और राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण भाषा बताया।

उन्होंने कहा कि भारत की विविधता में एकता को मजबूत करने में हिंदी की भूमिका महत्वपूर्ण है। विभिन्न क्षेत्रों और समुदायों के बीच संवाद एवं जुड़ाव में हिंदी योगदान देती है। उन्होंने हिंदी की सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखने के साथ इसे नई पीढ़ी की जरूरतों, आधुनिक तकनीक और नवाचार से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया।
कुलाधिपति ने साहित्यकार विभूतिभूषण उपाध्याय का स्मरण करते हुए हिंदी को भारतीय सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण आधार बताया। उन्होंने कहा कि किसी भाषा का वास्तविक संरक्षण केवल उसके सम्मान से नहीं, बल्कि उसके निरंतर और व्यापक प्रयोग से होता है।
उन्होंने विश्वविद्यालय परिवार और विद्यार्थियों से हिंदी के प्रति गर्व और आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ने तथा भाषा को आधुनिकता और नवाचार के नए आयामों से जोड़ने का आह्वान किया।
हिंदी पखवाड़ा में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागी सम्मानित
हिंदी पखवाड़ा 2026 के दौरान विश्वविद्यालय में विभिन्न साहित्यिक, शैक्षणिक, भाषायी और रचनात्मक प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया था। इस प्रतियोगिता में विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शिक्षकों और कर्मचारियों ने भाग लिया।
हिंदी पखवाड़ा के समापन समारोह के दौरान प्रतियोगिताओं में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले प्रतिभागियों को प्रमाण-पत्र प्रदान किए गए। विश्वविद्यालय की ओर से उनकी प्रतिभा और रचनात्मकता की सराहना करते हुए उन्हें भविष्य में भी हिंदी से जुड़ी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया गया।
समारोह समापन में आमंत्रित अतिथियों का किया गया धन्यवाद
समारोह के अंत में इतिहास विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. कंचन सिन्हा ने मुख्य अतिथि, अध्यक्ष, विशिष्ट अतिथियों, विश्वविद्यालय के पदाधिकारियों, विभागाध्यक्षों, शिक्षकों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
उन्होंने हिंदी पखवाड़ा 2026 को सफल बनाने में सहयोग देने वाले सभी सदस्यों के योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन विद्यार्थियों में हिंदी के प्रति रुचि और सम्मान विकसित करने के साथ उनकी रचनात्मक प्रतिभा को मंच प्रदान करते हैं।










