
मुंडवा में भाजपा के 10 पार्षद, बीजेपी उम्मीदवार को नहीं मिला एक भी वोट
नागौर/मुंडवा: राजनीति की गणित भी बड़ी अजीब है। कभी सीटें कम हों तो भी समीकरण ऐसा बन जाता है कि पूर्ण बहुमत से सरकार बन जाती है, और कभी सबसे ज्यादा सीटें हों तो भी हिसाब ऐसा बिगड़ता है कि दलों को मुंह की खानी पड़ती है। राजस्थान के नागौर जिले की मुंडवा नगरपालिका का अध्यक्ष चुनाव इसी राजनीतिक गणित का दिलचस्प उदाहरण साबित हो रहा है।
दरअसल 25 सदस्यीय नगरपालिका में भाजपा 10 पार्षदों के साथ सबसे बड़ा दल था। भाजपा आकंठ अहंकार में जी रही थी की वह अपने उम्मीदवार को आसानी से मुंडवा नगर पालिका का अध्यक्ष बना देगी। लेकिन जब चुनाव हुआ तो भाजपा की अधिकृत उम्मीदवार गीता देवी के खाते में 0 वोट आए। पार्टी के पास संख्या जरूर थी, लेकिन भाजपा की उम्मीदवार गीता देवी एक-एक वोट के लिए तरस गई।
भाजपा के दस पार्षद फिर भी शून्य वोट
मुंडवा नगरपालिका के चुनाव में भाजपा के 10, RLP के 7, कांग्रेस के 3 और निर्दलीय 5 पार्षद चुने गए थे। पार्षदों के बीच अब नगर अध्यक्ष का चुनाव होना था। जिसके लिए कांग्रेस और RLP ने अपने साझा उम्मीदवार के रूप में अलका देवी कंदोई को मैदान में उतारा जबकि भाजपा ने गीता देवी को नगर अध्यक्ष के पद के लिए टिकट दिया।
अध्यक्ष चुनाव में कांग्रेस और RLP दोनों दलों के पास मिलाकर 10 पार्षद थे। इसी बीच बीजेपी से बगावत कर घनश्याम सदावत ने निर्दलीय चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। इस करें मुकाबले में कंडोई को 13 वोट मिले और सदावत को 12 वोट मिले। बीजेपी की गीता देवी 0 पर आउट हो गईं।
सबसे बड़ा सवाल, गीता को वोट क्यूं नहीं मिले
गौर करने वाली बात यह है कि भाजपा सबसे बड़ा दल होने के बावजूद अध्यक्ष पद की दौड़ में अपनी उम्मीदवार को एक वोट भी क्यूं नहीं दिला सकी। यानी सीटों की गिनती में पार्टी सबसे आगे और अध्यक्ष पद के वोट में किसी ने भी वोट नहीं दिया।
दरअसल घनश्याम सदावत को उम्मीद थी कि भाजपा से अध्यक्ष पद के लिए उन्हें टिकट मिलेगा। लेकिन जैसे ही पार्टी ने गीता देवी का नाम घोषित किया सदावत निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतर गए। अध्यक्ष चुनाव में सदावत ने 12 वोट हासिल किए और जीत से सिर्फ एक वोट दूर रह गए। और बीजेपी ‘0’ पर आउट।
कांग्रेस-RLP का ’10 से 13′ पहुंचा आंकड़ा
दूसरी तरफ कांग्रेस और RLP के पास कुल 10 पार्षद थे। दोनों ने साझा उम्मीदवार के रूप में अलका देवी कंडोई को मैदान में उतारा। लेकिन परिणाम आया तो उनके खाते में 13 वोट थे। मतलब गठबंधन के पास जितने वोट थे, उससे तीन वोट ज्यादा। यानी 3 बीजेपी के पार्षद या निर्दलीयों ने क्रॉस वोटिंग किया।
कभी चींटी भी दे देती है हांथी को मात
मुंडवा का चुनाव राजनीति की एक अहम तस्वीर भी दिखाता है जिसमें ज्यादा पार्षद होने भर से अध्यक्ष की कुर्शी नहीं मिल जाती। भाजपा 10 पार्षदों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी, लेकिन अध्यक्ष पद हाथ नहीं आया। कांग्रेस-RLP गठबंधन के 10 पार्षद थे लेकिन 13 वोट जुटाकर बाजी पलट दी।
मुंडवा का परिणाम अब भाजपा के लिए केवल एक चुनावी हार नहीं, बल्कि संगठनात्मक तालमेल और स्थानीय समीकरणों पर चर्चा का विषय बन गया है।राजनीति में कभी-कभी पूरा किस्सा बड़े भाषणों से नहीं, सिर्फ एक अंक से समझ में आ जाता है और मुंडवा में इस बार वह अंक था ‘0’शून्य।










