बिहार विधानसभा चुनाव की तारीख के घोषणा के दिन शुरू हुआ पटना मेट्रो प्रशासनिक अदूरदर्शिता का खामियाजा भुगत रहा है। पटना मेट्रो का जमीन के अलावा सब किराए का है। जिस पर किए जा रहा खर्चे ने पटना मेट्रो को घाटे में डाल दिया है।
6 अक्टूबर 2205 को पटना मेट्रो का परिचालन शुरू किया गया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने पुणे से भाड़े पर आए इस ट्रेन का बड़े लाव लश्कर के साथ उद्घाटन किया। पुणे से भाड़े पर जो पुरानी ट्रेन आई है उसका किराया ही महीने का 58.75 है और यह 3 साल की लीज पर लिया गया है जिसपर 21 करोड़ की लागत आएगी। जबकि नई ट्रेन की कीमत ही 30 से 35 करोड़ के बीच है।इसके रख रखाव का जिम्मा DMRC(Delhi Metro Rail Corporation) को दिया गया है जिस पर कुल 180 करोड़ का खर्च है। मतलब जनता की कमाई का करोड़ों रुपए केवल किराए पर खर्च हो रहा है। इस परियोजना के लिए सरकार बिहार के लोगों को रोजगार दे सकती थी, लेकिन इसमें भी सरकार फिसड्डी साबित हुई है।
पटना मेट्रो का परिचालन अभी साढ़े 4 किलोमीटर के दायरे में ही है। जो अगस्त तक 9 किलोमीटर होने की संभावना है। अभी औसतन 7000 यात्री यात्रा कर रहे हैं जिनसे कुल दैनिक कमाई लगभग 45000 हजार के आस पास है। मतलब ट्रेन का किराया भी अभी जनता से उगाहे गए टैक्स के पैसे से चुकाया जा रहा है।
अभी भारत के 26 शहरों में मेट्रो दौड़ रही है। पटना मेट्रो के जैसी स्थिति ही भोपाल और इंदौर का है। यहां की मेट्रो भी घाटे में चल रही है। भोपाल मेट्रो का एक दिन का ऑपरेशनल कॉस्ट लगभग 8 लाख का है वही कमाई औसतन 15000 से 40000 हजार के बीच ही हो पता है। भोपाल में मेट्रो 7 किलोमीटर के दायरे में चलती है और सबसे बड़ी बात दिन के 12 बजे से शाम के 7:30 बजे तक ही मेट्रो की सेवा है। यहां की राज्य सरकार की अकर्मण्यता और अदूरदर्शिता साफ साफ दिखती है।
अब दिल्ली मेट्रो रेल कॉर्पोरेशन (DMRC) द्वारा संचालित देश की राजधानी दिल्ली मेट्रो की जानकारी भी जरूरी है जिससे पटना और भोपाल की स्थिति को जानने में आसानी होगी। तो सीधे-सीधे यह जान लीजिए की दिल्ली की मेट्रो की कमाई में पटना और भोपाल का भी योगदान है क्योंकि पटना और भोपाल मेट्रो के रखरखाव की पूरी जिम्मेदारी दिल्ली मेट्रो को मिली हुई है और जो दिल्ली मेट्रो को लगभग 413 करोड रुपए साल की नेट प्रॉफिट है उसमें पटना और भोपाल मेट्रो का भी योगदान है।
दिल्ली मेट्रो की रोज की कमाई 10 करोड रुपए से ऊपर का है जिसमें सबसे बड़ा हिस्सा टिकट से है उसके बाद दूसरा आय का श्रोत मेट्रो स्टेशनों पर लगे विज्ञापन से आते हैं उसका रेंट दिल्ली मेट्रो को प्राप्त होता है साथ ही अन्य शहरों के मेट्रो प्रोजेक्ट के लिए भी DMRC तकनीकी परामर्श देती है वो भी आय का एक प्रमुख साधन है।
पटना या भोपाल मेट्रो जितना किराया के तौर पर ट्रेन के लिए तीन साल में चुकाएगी उसमें अगर 10 करोड और जोर दिया जाए तो नई ट्रेन आ जाएगी और किराए का एक बड़ा हिस्सा मुनाफे के तौर पर बचाया जा सकता है। सरकार के सलाहकार सरकार और जनता की बेहतरी के लिए होते हैं जबकि यहां जनता की गाढ़ी कमाई को किराए में उड़ा रहे हैं।










