ये हकीकत है। इन 2700 सालों में कई पीढ़ियों खत्म हो गई लेकिन दूसरे देश में आकर भी 2700 सालों में अपनी सभ्यता संस्कृति को बचाए रखा और अपने मूल स्थान से नजदीकी भी बनाए रखा। यही मजबूत संस्कृति इन लोगों का अपने मूल निवास स्थान की वापसी का जरिया भी बना और अब ये 2700 सालों बाद वापस लौट रहे हैं।
ये लोग असल में इजरायल के बेनी मेनासे यहूदी समुदाय के लोग हैं। यह समुदाय खुद को बाईबल में बताए गए मनश्शे कबीले का वंशज मानते हैं। अब इजराइल ने इन्हें अपने देश का नागरिक माना है 2700 साल बाद इस वंशज के 5800 लोगों की घर वापसी हो रही है। ये लोग अब तक भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों मणिपुर और मिजोरम में रह रहे थे।
बेनी मेनासे का इतिहास और कैसे आए भारत
भारत में रहने वाले इस क़बीलाई जनजाति बेनी मेनासे के लोग खुद को बाईबल में बताए गए मनश्शे कबीले का वंशज मानते हैं। इजराइल से खोए हुए 10 कबीलों में इनका भी नाम आता है। 2005 में तत्कालीन चीफ रब्बी ने इन्हें इजराइल के खोए हुए कबीले वंशज के तौर पर मान्यता दे दी। इसके साथ ही इनके इजराइल वापसी का रास्ता खुल गया था।
इस जनजाति का मानना है कि 2700 साल पहले नियो-असीरियन साम्राज्य ने इजराइल के उत्तरी भाग पर हमला किया जहां इन्हें जीत हासिल की। इसके परिणामस्वरूप इन्होंने बेनी मेनासे जनजाति को देश से निकाल दिया गया जो वहां के मूलनिवाशी थे। अपनी जमीन से बेदखल होने के बाद ये लोग सदियों तक फारस, अफगानिस्ता और चीन तिब्बत तक भटकते रहे। आखिर में इस जनजाति ने म्यांमार को पार कर भारत मणिपुर और मिजोरम में अपना ठिकाना बनाया।
अब जबकि इनकी 2700 सालों बाद इस जनजाति की इजराइल में वापसी हो रही है। तो इनका पुनर्वास भी इजराइल के उत्तरी क्षेत्र में ही कराया जा रहा है, जहां से इनको बेदखल किया गया था। इसके पीछे जो रणनीति बताई गई है कि इजराइल में 73% ही जनसंख्या यहूदियों की है। और यह अपने देश में पूरे विश्व से सभी यहूदियों को वापस बुलाया जा रहा है। जिससे जनसंख्या परिवर्तन न हो और फिलिस्तीन पर भी एक मनोवैज्ञानिक दबाव बना रहे।








