मध्यप्रदेश में साल 2011 में गाय के गोबर, गौमूत्र और पंचगव्य से कैंसर के इलाज के लिए रिसर्च के नाम पर 3.5 करोड़ रुपए आवंटित किए गए थे। जिसमें करोड़ों रुपए का घोटाला सामने आ रहा है। 14 साल में अब तक कुछ नहीं हुआ। इससे मध्यप्रदेश के किसानों को भी लाभ मिलने की बात कही गई थी।
अब तक जो जांच हुई है उसमें 1.9 करोड़ रुपए रिसर्च के लिए कच्चा माल, गोबर, गौमूत्र और मशीनों पर खर्च कर दिए गए। जबकि जांच में इन सब का वास्तविक मूल्य 15 से 20 लाख बताया गया है। रिसर्च के नाम पर 2012 से 18 के बीच बैंगलोर और गोवा की हवाई यात्रा और सैर सपाटे में व्यय कर दिया गया। 7.50 लाख में एक कार खरीदी गई और इसके रखरखाव और ईंधन पर भी इतने ही पैसे खर्च किए गए। केवल मजदूरी पर 3.50 लाख खर्च कर दिए गए और रिसर्च के नाम पर जो मशीनें खरीदी गई उसपर 15 लाख का खर्च होना बताया है।
अब जिस पंचगव्य की बात की गई थी जिससे किसानों को फायदा मिलना बताया गया था वो होता क्या है। पंचगव्य के अंतर्गत गाय से प्राप्त 5 उत्पादों जैसे दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण है, जिसे आयुर्वेद में औषधी बताया गया है। जो किसानों और गौपालकों से खरीदने और किसानों को ट्रेनिंग देना था, अब तक एक भी किसान इससे लाभान्वित नहीं हुए।
यह घोटाला सामने आई कैसे: इस रिसर्च का परिणाम जानने के लिए एक शिकायती पत्र जबलपुर के संभाग आयुक्त को प्राप्त हुआ था। इसकी जांच करने के लिए जबलपुर कलेक्टर ने डिप्टी कलेक्टर रघुवीर सिंह मरावी और कोष अधिकारी विनायकी लकड़ा को नियुक्त किया गया। जांच के दौरान यह पाया गया कि रिसर्च के लिए कोई रूप रेखा ही तय नहीं की गई थी।
जांच पर एक नया खुलासा: विश्विद्यालय के कुलपति मनदीप शर्मा ने जांच पर तो कुछ भी नहीं कहा लेकिन रिसर्च के विषय को ही इन्होंने पलट दिया। कुलपति के अनुसार इस प्रोजेक्ट के अनुसार गोवंश के मूत्र एवं गोबर द्वारा पंचगव्य उत्पादों का निर्माण एवं स्वदेशी और शंकर गायों के मूत्र एवं गोबर द्वारा पंचगव्य उत्पादों का तुलनात्मक अध्ययन करना था।
अब जांच में जो बातें सामने आई है उसे अध्ययन के लिए सरकार को भेजा जाएगा। सरकार इसपर क्या निर्णय लेती है ये देखने वाली बात होगी।








