
सुनील कुमार, महासचिव, ब्रह्मर्षि विकास संगठन, मुजफ्फरपुर
देश में नीट परीक्षा, यूजीसी से जुड़े विवाद और शिक्षा व्यवस्था को लेकर लगातार राजनीतिक बहस जारी है। विपक्ष केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहा है, वहीं सरकार का कहना है कि दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की जा रही है।
मेरे विचार से यह प्रश्न महत्वपूर्ण है कि आंदोलन का वास्तविक उद्देश्य केवल शिक्षा मंत्री का इस्तीफा है या व्यापक राजनीतिक दबाव बनाना। इस पर विभिन्न राजनीतिक दलों और सामाजिक संगठनों की अपनी-अपनी राय है।
नीट परीक्षा में अनियमितताओं ने लाखों छात्रों और उनके परिवारों की चिंता बढ़ाई है। दोषियों की गिरफ्तारी स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन केवल गिरफ्तारी से छात्रों का भविष्य सुरक्षित नहीं हो जाता। आवश्यक है कि ऐसी व्यवस्था बने जिससे भविष्य में परीक्षा की निष्पक्षता पर कोई प्रश्नचिह्न न लगे।
एक महत्वपूर्ण मुद्दा निजी मेडिकल कॉलेजों की अत्यधिक फीस भी है। यदि चिकित्सा शिक्षा अधिक सुलभ और किफायती बनाई जाए तथा प्रवेश प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो, तो भ्रष्टाचार और अवैध गतिविधियों की संभावना काफी हद तक कम हो सकती है।
सरकार से अपेक्षा है कि वह केवल दोषियों पर कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार लागू करे। साथ ही, सभी राजनीतिक दलों को भी छात्रों के भविष्य को राजनीति से ऊपर रखते हुए समाधान-केंद्रित भूमिका निभानी चाहिए।
लोकतंत्र में विरोध और समर्थन दोनों का अधिकार है, लेकिन किसी भी आंदोलन का केंद्र छात्रों का हित और शिक्षा व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। अंततः देश और विद्यार्थियों के हित में पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध सुधार ही सबसे प्रभावी समाधान हैं।

(यह लेखक के व्यक्तिगत विचार हैं। इनसे सभी का सहमत होना आवश्यक नहीं है।)












3 Responses
बिल्कुल सही
जब से दिल्ली में विरोध-प्रदर्शन शुरू होने के बाद मैंने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग की है, तब से धर्मेंद्र प्रधान के कुछ नाजायज़ बच्चे बहुत आहत महसूस कर रहे हैं। वे बार-बार पूछते हैं, “धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े से क्या हासिल होगा? क्या इससे पेपर लीक रुकेंगे?” “अरे नहीं, इससे पेपर लीक नहीं रुकेंगे।” धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की मांग करना पूरी तरह से देश-विरोधी है। अब हम धर्मेंद्र प्रधान के लिए भारत रत्न की मांग करते हैं। तो, आज से, हम जैसे सभी छात्र धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफ़े की अपनी मांग वापस ले रहे हैं। आइए उन्हें भारत रत्न दिलवाते हैं। इससे देश में पेपर लीक रुक जाएंगे। जहां तक पेपर लीक रोकने की बात है, तो उनके तर्क के अनुसार, पूरा सिस्टम ऐसा होना चाहिए कि देश में किसी भी बलात्कारी को बलात्कार के लिए सज़ा न मिले, क्योंकि बलात्कारी को सज़ा देने से बलात्कार नहीं रुकता। देश में किसी भी चोर को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए, क्योंकि चोर को सज़ा देने से चोरी नहीं रुकती। देश में किसी भी अपराधी को सज़ा नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि अपराधियों को सज़ा देने से अपराध नहीं रुकता। इन लोगों के अनुसार, सिस्टम जैसा है वैसा ही चलता रहना चाहिए, और मुझे यह बात समझ नहीं आती। जब सरकार से इस्तीफ़े की मांग की जा रही है तो दूसरों को तकलीफ़ क्यों हो रही है? भाई, आपको इस बात से तकलीफ़ क्यों हो रही है? आप सरकार की तरफ़ से क्यों लड़ रहे हैं? क्या आप सरकार हैं? या पेपर लीक से मिला सारा पैसा आपके घरों में भेजा गया है और आपको इतनी तकलीफ़ हो रही है? यह चिंता का विषय है। यह देश ऐसे ही मानसिंहों और जयचंदों की वजह से गुलाम बना था। ये वही लोग हैं जो गुलामी के दौर में जाकर झुक जाते थे और देश पर राज करने वाले राजाओं के पास अपनी माताओं और बहनों को भेज देते थे। ये वही लोग हैं जिनके खून में किसी तरह की वफ़ादारी नहीं हो सकती, जिनके खून में कोई आत्म-सम्मान नहीं हो सकता। उनका खून गंदा है। ये वही लोग हैं जो आज अपने बच्चों का साथ देने में असमर्थ हैं, वरना वे सड़कों पर उतरकर कहते, “हम कॉकरोच को डंडे से मारेंगे।” हम उन्हें डंडे से क्यों मारेंगे? देश के सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश ने आकर कहा कि देश के बेरोज़गार युवा कॉकरोच हैं। और फिर, जब इस देश ने यह मान लिया कि हाँ, हम कॉकरोच हैं, तब आज आप सड़कों पर उतर रहे हैं। जब UGC कानून पास हुआ था, तब आप कहाँ थे? आप चुपचाप बैठे रहे, अपनी सरकार का समर्थन करते रहे और उसे बढ़ावा देते रहे। आज, जब सरकार से सवाल पूछने का मौका आया, तो सवाल पूछने के बजाय आप उसके साथ खड़े रहे। यह याद रखें: भीड़ लोकतंत्र का हिस्सा है; लोकतंत्र भीड़ से ही बनता है। और जब समय आया, तो इसी भीड़ ने 1789 में राजा को उखाड़ फेंका था, और एक बार चाणक्य के नेतृत्व में धनानंद को भी सत्ता से हटा दिया था। आपको भी सत्ता से हटा दिया जाएगा। इंदिरा गांधी को भी सत्ता से हटाया गया था, और एक छात्र के तौर पर आपको भी देश-विरोधी करार दिया जा रहा है, इसलिए डरें नहीं। इस देश में चंद्रशेखर से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी तक, सभी को 1975 में देश-विरोधी करार दिया गया था और जेल में डाला गया था। हर पीढ़ी को ‘देश-विरोधी’ का ठप्पा झेलते हुए लड़ना पड़ा है, और तभी यह देश बचा रह पाया है। आपके और हमारे पूर्वजों ने देश के लिए लड़ाई लड़ी है, और हम भी आज लड़ रहे हैं और आगे भी लड़ते रहेंगे। लड़ते रहिए, आगे बढ़ते रहिए लेकिन एक स्वस्थ्य और साफ विचार व मानसिकता के साथ।
जय हिन्द, जय भारत, वन्देमातरम
इस तरह की किसी भी खबर को उठाकर देखिए मैने कभी कुछ ऐसा नहीं लिखा जिसमें खबर जिन्दगी सरकार के साथ हो। सच्ची पत्रकारिता वही है जो दिखे, बिना डर के बेधड़क लिखिए। मैने वही लिखा है। जो भी जितनी गलत करेगा और कहेगा, वही छपेगा। इसलिए खबर जिन्दगी “सच आपतक”