बिहार सरकार बिहार की बेरोजगारी को कम करने के लिए पिछले सालों में रोजगार के नए अवसर तलाशने में लगी है। इस को लेकर सरकारी कर्मचारियों की संख्या में भी काफी बढ़ोतरी हुई है। जिनपर सरकार के बजट का एक बड़ा तिहाई हिस्सा वेतन पर खर्च कर रही है।
बिहार चुनाव के बाद नीतीश सरकार द्वारा 2026-27 के लिए पूर्णकालिक बजट पेश किया जिसमें 3 लाख 45 हजार करोड़ का बजट पेश किया। जिसमें कहा गया कि सरकार 70 हजार 220 करोड़ का वेतन और लगभग 35 हजार करोड़ पेंशन के मद में खर्च करने की बात कही है है।
पिछले 20 सालों में अगर देखिए तो वेतन पर 13 गुणा खर्च बढ़ गया है और पेंशन मद में 17 गुणा बढ़ चुका है।20 साल पहले बिहार की कमान जब नीतीश कुमार के हाथों में आई तब बिहार के बजट का वेतन पर 5152 करोड़ रुपया खर्च था। जबकि पेंशन पर 2456 करोड़ रुपए का भर था।
अब बिहार के बगल के राज्य उत्तरप्रदेश के साथ इसकी तुलना करें तो बिहार से लगभग 08 प्रतिशत कम है। इसका मतलब है कि उत्तरप्रदेश सरकार सरकारी नौकरी उपलब्ध कराने में बिहार से ही नहीं बल्कि भारत के 20 राज्यों में पीछे है। लेकिन उत्तरप्रदेश सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर विकास पर बिहार से ज्यादा खर्च कर रही है जिसमें निजी स्तर पर युवाओं को रोजगार के अनेक क्षेत्र उपलब्ध हो रहे हैं।
बिहार से अलग हुए राज्य झारखंड की स्थिति पर नजर डालिए तो झारखंड सरकार का (2025-26) बजट में लोककल्याण के लिए खर्च जरूर हैं लेकिन वेतन और पेंशन पर खर्च लगभग 15 प्रतिशत है। वहीं अन्य योजनाओं के तहत झारखंड सरकार लोककल्याण पर कुल बजट का लगभग 33 प्रतिशत का खर्च का अनुमान है।
एक बात अवश्य कहेंगे कि नीतीश कुमार और सरकार की रोजगारोन्मुखी कार्यक्रम से राज्य को गरीबी से बाहर लाने और पलायन को कम करने में सफलता मिल सकती है।










