1982 में रिलीज हुई फिल्म “नदिया के पार” को हिंदी और भोजपुरी भाषी क्षेत्रों में सबसे हिट फिल्म मानी गई थी। ग्रामीण परिवेश पर बनी इस फिल्म ने लोगो के जहन में एक अमिट छाप छोड़ी जो आज भी वैसे ही लोगों की जहन में जगह बनाए हुए है। ‘गूंजा’ और ‘चंदन’ के किरदार ने लोगों के दिलों दिमाग पर एक अमिट छाप छोड़ी।
बिहार में स्पेशल स्क्रीनिंग के तहत बिहार स्टेट फिल्म डेवलपमेंट एंड फाइनेंस कॉर्पोरेशन के वीकली प्रोग्राम ‘कॉफी विद फिल्म’ के तहत गांधी मैदान स्थित रीजेंट सिनेमा कैंपस के हाउस ऑफ वैरायटी में ‘नदिया के पार’ की स्पेशल स्क्रीनिंग हो रही है। बिहार सरकार के कला, संस्कृति और युवा विभाग द्वारा आयोजित यह पहल है, जो नियमित रूप से ऐसी फिल्में दिखाती है जो बिहार की सांस्कृतिक पहचान को दर्शाती हैं।
“कौने दिशा में लेके चल रे बटोहिया” और होली के गीत “जोगीड़ा धीरे धीरे” आज भी इस गीत के बोल इतने मधुर और कर्णप्रिय हैं कि सुनने वाले आज भी इसे बार बार लगातार सुनते हैं। साल 1982 में रिलीज हुई फिल्म नदिया के पार आज भी लोगों के दिलों में बसती है। यह फिल्म बिहार और उत्तरप्रदेश के पूर्वांचल के इलाकों को ध्यान में रख गढ़ी गई कहानी केशव प्रसाद मिश्र के उपन्यास “कोहबर के शर्त” के आधार पर थी। इसका ग्रामीण परिवेश और अंदाज के साथ मानवीय मूल्यों पर आधारित पारिवारिक तानाबुना फिल्म को एक अलग पहचान दिलाता है।
राजश्री प्रोडक्शंस के बैनर तले ताराचंद बड़जात्या द्वारा निर्मित और गोविंद मूनिस द्वारा निर्देशित, नदिया के पार 1982 में रिलीज होने पर एक बहुत बड़ी हिट थी। उस समय, राजश्री भारतीय मूल्यों पर आधारित कम बजट की पारिवारिक फिल्में बनाने के लिए जानी जाती थी और यह फिल्म अपनी सादगी, भावनात्मक गहराई के लिए सबसे अलग थी। सालों से, इसे एक आइकॉनिक दर्जा मिला है। साल 1994 में ताराचंद बड़जात्या के पोते सूरज आर बड़जात्या ने इस कहानी को शहरी माहौल में “हम आपके हैं कौन” के नाम से बनाया जो ब्लॉकबस्टर फिल्म साबित हुआ और अब तक की सबसे सफल हिंदी फिल्मों में से एक है।










