
बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजे चौंकाने वाले ही नहीं बल्कि निश्चित तौर पर इसे अप्रत्याशित कहेंगे। दावे से कहा सकता जा सकता है कि राजनीतिक दलों ने भी ऐसे परिणाम की कल्पना भी नहीं की होगी। बिहार विधान सभा के परिणाम ने एग्जिट पोल को भी धराशाई कर दिया। एग्जिट पोल ने NDA को 145 सीटे जीतने की बात कही है थी। अंतिम परिणाम आते आते 202 तक ये आंकड़ा पहुंच गया। पूरा बिहार “नी-मो” से सराबोर दिख रहा है। नीतीश और मोदी की रणनीति ने बिहार को “नी-मो” युक्त कर दिया है।
तेजस्वी और राहुल के चुनावी सभा में वोट-चोर के नारे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर नकारात्मक स्वरूप में व्यक्तिगत हमले ने महागठबंधन को बिहार चुनाव में पूरी तरह से बाहर कर दिया। चुनाव के छः महीने पहले से वोट-चोर का नारा लगाना बस एक संयोग नहीं था। इसे उठाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण लालू यादव ही थे।
मतदाताओं से करने में जो बात निकल का सामने आई उसके अनुसार कि तेजस्वी को अच्छे से पता था कि चुनाव में हमेशा की तरह NDA की तरफ से राजद के ऊपर चारा घोटाला, जंगलराज और लालू यादव और उनके परिवार का जिन घोटालों में शामिल होने का आरोप है उसे जरूर उठाया जाएगा। इसी आरोपों की काट के तौर पर राजद और कांग्रेस की तरफ से एक मुहिम के तौर पर वोटे-चोरी का मुद्दा उठाया गया। लेकिन बिहार के जनमानस ने इस मुद्दे को खारिज करते हुए नरेंद्र मोदी और उनकी मां के ऊपर जिस तरह से महागठबंधन की तरफ से टिप्पणियां की गई, उसे गलत माना और मतदाताओं का रुझान NDA की तरफ शिफ्ट हो गया।
वैसे कहा ये जा सकता है कि मोदी और नीतिश की जोड़ी ने 20 साल पहले की स्थिति और 20 सालों के अंदर हुए विकास की ऐसी माला पिरोई की पूरा चुनाव ही एकतरफा साबित हो गया।








