बिहार का विधानसभा चुनाव ऐसे वक्त पर है जब पूरा बिहार छठमय हो चुका है। और इसका लाभ प्रत्याशी उठाने में लगे हुए हैं। इस बार काम के सिलसिले में बिहार से बाहर काम करने वाले भी छठ पर्व को मनाने अपने अपने घर पहुंचे हुए हैं। चुनाव का वक्त भी है सो, प्रत्याशियों द्वारा छठ पूजा को सिर्फ धार्मिक अनुष्ठान के तौर पर न देख कर प्रचार प्रसार के साधन के तौर पर भी देखा जा रहा है। ऐसा हाल सिर्फ मुजफ्फरपुर में ही नहीं बल्कि पूरे सूबे में दिख रहा है। जहां सारे प्रत्याशी लोगों से जुड़ने और अपनी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए छठ घाट पर लोगों के पहुंचने का इंतजार कर रहे हैं। जहां वो जनता से सीधे संवाद करेंगे।

क्योंकि बैनर पोस्टर लगाने की चुनाव आयोग से पूर्ण रूप से मनाही है। तो इस बार छठ पर्व पर आयोजित हो रहे में छठ गीतों पर भी चुनाव का प्रभाव देखा जा रहा है। पारंपरिक छठ गीतों में भी राजनीतिक दल द्वारा अपनी मौजूदगी दर्ज कराने को स्थानीय कलाकारों के माध्यम से छठ गीतों में चुनावी संदेशों को शामिल करने जैसे रचनात्मक तरीकों को अपनाया जा रहा हैं।
राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों के प्रचार का साधन प्रसाद भी बनने वाला है। खड़ना और पारण के दिन घर घर प्रसाद पाने और ग्रहण करने की योजना भी प्रत्याशियों के प्रचार के साधन के तौर पर देखा जा रहा है। यह रणनीति उन्हें व्यक्तिगत स्तर पर मतदाताओं के साथ एक भावनात्मक संबंध के साथ साथ पारिवारिक माहौल में अपनी विनम्रता प्रदर्शित करने का मौका भी देगी।
प्रत्याशियों का मुख्य उद्देश्य पर्व की पवित्रता को बनाए रखते हुए अधिक से अधिक लोगों तक अपनी छवि और संदेश पहुंचाने का जरिया बनाना है। इस चुनावी दौर में इस बार का छठ पूजा आस्था, संस्कृति और सियासत का अनूठा संगम जैसा प्रतीत होगा।








