भारत में हिंदू या सनातन पर प्रहार मुगलों के शासनकाल में जो शुरू हुआ वो आज भी अनवरत जारी है। तब भारत का शासन मुगलों के हाथों में था और आज आजाद भारत में राजनीतिक दलों के हाथों में है। आज के राजनीतिक दल के नेता खुद की प्रोफाइल चमकाने में पूरी सभ्यता संस्कृति के चादर को तार तार करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ रहे।
हम मुगल काल में न जाते हुए स्वतंत्र भारत में इसकी शुरुआत कब होती है और अंत तब तक नहीं होगी जब तक कि राजनीतिक जिजीविषा खत्म नहीं होगी। अभी हाल में तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने हिंदुओं के भगवान और देवी देवताओं पर जिस तरह से प्रहार किया गया उससे बीजेपी वाले ही नहीं बल्कि बीआरएस पार्टी भी तेलंगाना के कांग्रेसी मुख्यमंत्री पर हमलावर है।
वैसे हिन्दू देवी देवताओं या ग्रंथों पर राजनीतिक रूप से प्रहार का पहला प्रमाण उत्तरप्रदेश से ही मिलता है 1974 में पहली बार रामायण की प्रति फाड़ी गई और वो भी पूरे सदम के सामने। सोशलिस्ट पार्टी से डेरापुर के विधायक रामपाल सिंह यादव वो पहले नेता थे जिन्हें “ढोल, गंवार, शूद्र, पसु नारी। ये सब ताड़न के अधिकारी” तुलसीदास जी की बात चुभ गई। इनको इस बात का गहरा ठेस लगा और इन्होंने भरे सदन में तुलसीदास जी की रामचरितमानस के पन्नों को फाड़ दिया। अगले दिन अखबारों से लोगों को जानकारी मिली। लोगों ने विरोध प्रदर्शन किया और 1977 के चुनाव में लोगों को लगी भावनात्मक ठेस ने इन्हें कही का नहीं छोड़ा, करारी हार हुई। अब इनका नाम भी रामायण फाड़ यादव रख दिया गया। चुनाव दर चुनाव लोगों की भावनात्मक ठेस इनके ऊपर हावी रही। जिससे इनका राजनीतिक करियर की दुकान पूरी तरह बंद हो गई।
ठीक इस घटना के 47 साल बाद एक बार फिर समाजवादी पार्टी के अंदर से रामचरितमानस के खिलाफ आवाज सुनाई दी। समाजवादी पार्टी के नेता स्वामी प्रसाद मौर्य ने उसी चौपाई पर आपत्ति जताई और रामचरितमानस को बकवास करार दिया। प्रदेश में उनका जमकर विरोध हुआ। यहां तक कि उनकी अपनी पार्टी के नेता भी उनके बयान को उनका व्यक्तिगत बयान करार दिया था। मौर्य का भी बयान अभी तक उनके ऊपर अभिशाप की तरह चिपका हुआ है। आगे 2027 में फिर से UP का विधानसभा चुनाव होना है देखना होगा कि ये तुलसीदास जी के शाप से बाहर निकल पाते है या नहीं।
इसके बाद तो कांग्रेस और तमिलनाडु के सत्ताधारी मुख्यमंत्री के बेटे ने ही सनातन को लेकर कई बार जहर उगला है। और अभी अभी रेवंत रेड्डी, कहने को मुख्यमंत्री हैं लेकिन खुद ही इन्होंने कुछ दिन पहले स्वीकार किया था कि कांग्रेस मुसलमानों की पार्टी है।
आखिर भारत के राजनीतिक दल हिंदुओं को ही सॉफ्ट टारगेट क्यूं समझते है। इसके पीछे की वजह को अगर आसान शब्दों में कहा जाए तो सनातनी लोग सबके साथ मिलजुल कर रहने वाला प्रजाति में आते हैं और प्रजाति हमेशा कमजोरों में गिना जाता है।








