शास्त्रार्थ के बाद होता था चयन
विलुप्त होती मिथिला की सौराठ सभा..जहां बिना चमक दमक और दहेज की शादियां होती थी
आज हम बिहार में शादियों की एक ऐसी परम्परा को आपके साथ साझा करने जा रहें है जो समय के साथ धूमिल होती चली गईं। बिहार के मिथिलांचल क्षेत्र के बच्चों की शादियां सभा के द्वारा तय होती थी और उसमें वर पक्ष और वधू पक्ष के बीच शास्त्रार्थ होता था। और सबसे बड़ी बात यह शादी बिना दहेज के संपन्न होती थी।
शादियों का रूप जो आज समाज में प्रचलित हैं, दान दहेज और दिखावे की प्रथा बन चुकी है। वहीं सदियों से मिथिलांचल में मैथिल ब्राह्मण और कर्ण कायस्थ समाज के बच्चों की शादियां सभा के द्वारा तय होती हैं। जहां हर साल ज्येष्ठ या अषाढ़ महिनें में सौराठ के सभागाछी में वर पक्ष के लोग पारंपरिक वेशभूषा में सज धज कर पेड़ के निचे दरी चादर बिछाकर दूल्हे के साथ बैठते हैं। फिर कन्या पक्ष के लोग उन्हें देख कर रिश्ते का प्रस्ताव रखते थे। दोनों ओर से शास्त्रार्थ होता था।जब वधू पक्ष को दूल्हा पसंद हो जाता है तब पंजीकार से सलाह ली जाती है और विवाह की प्रक्रिया शुरू होती है।
इस विषय के जानकार लोगों का कहना है कि राजा हरिसिंह देव के समय सभागाछी की शुरुआत हुई थी। इस मेला में बगैर दान दहेज के योग्य लड़के की शादी की परंपरा सदियों से चली आ रही हैं। समय के साथ समाजिक परिवर्तनों के कारण अब यह परंपरा नाम मात्र का बचा है।
केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की पत्रिका भाषा में प्रकाशित रिपुंजय कुमार ठाकुर के लेख के अनुसार सौराठ मिथिला क्षेत्र के मधुबनी जिले में एक ऐतिहासिक सांस्कृतिक गांव हैं। ब्रिटिश भारत सरकार के पुरातत्व सर्वेक्षक अलेक्जेंडर कनिंघम ने इस गांव का सर्वेक्षण ओईनवार वंश के एक अभिलेख या छाप लेने के लिए किया था जो 14 वीं सदी से संबंधित हैं। सौराठ सभा पर डाॅ राकेश कुमार ने अपने शोध पत्र में लिखा है कि इस सभा में विवाह के पूर्व कर्ण कायस्थ और मैथिल ब्राह्मण के वंश को देखने के लिए पंजीकरण का रिकॉर्ड देखा जाता है।पंजी का रिकॉर्ड रखने वाले को पंजीकार कहां जाता है। यह पंजीकार कई पीढ़ियों से यह काम कर रहे हैं।
मिथिलांचल इतिहास के विषय में अच्छी जानकारी रखने वाले दरभंगा जिले के योगीयारा गांव के रामानंद प्रसाद ठाकुर का कहना हैं कि बदलाव प्रकृति का नियम है लेकिन हमें अपने सांस्कृतिक परंपरा को बचाएं रखना भी जरूरी है। सरकार मिथिला में माता सीता की जन्मस्थली के उद्धार और मखाना को विशिष्ट पहचान दिलाने के लिए जो सराहनीय कार्य किया है। उसी तरह सौराठ सभा के पुराने वैभव को वापस लाने के लिए प्रयास करना चाहिए। क्योंकि सौराठ मेला केवल जीवनसाथी चुनने का एक पारंपरिक मंच नहीं बल्कि यह मिथिला की सामाजिक एकता, ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक गौरव का भी प्रतीक हैं।










