हरदी मेला बिहार की एक जीवंत सांस्कृतिक परंपरा है। आधुनिकता की तरफ भागते गांव और मोबाइल में सिमटते बाजार के बीच सोनपुर मेले की तरह ही इस इस मेले की एक खास पहचान लोगों के जहन में अब भी बसा है। यह मेला स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। यह मेला सरस्वती पूजा से होली के बीच हरदी ग्राम में लगता था।
मुजफ्फरपुर जिले का हरदी मेला धरोहर है मुजफ्फरपुर का। उत्तर बिहार में सोनपुर मेला के बाद हरदी मेला का ही नंबर आता है। 1990 के पहले इस मेला का स्वर्णिम काल था जब जिले के पश्चिमी क्षेत्र के लोगों के लिए यह सिर्फ मवेशियों का मेला नहीं बल्कि साल भर के अपने रोजमर्रा के सामानों को खरीदने का प्रमुख केन्द्र था। यहां से मिर्च-मसाला, दरी-चादर, पलंग-चौकी,ओखली-मूसल, खूरपी-कुदाल और खेती के सभी सामान खरीद कर लोग ले जाते थे।इसी मेला में गांव-जवार वाले अपने-अपने बेटे-बेटियों के रिश्ते भी तय कर लेते थे।
आधुनिकता के इस दौर में सब खत्म हो रहा है। गांव अब गांव नहीं रहा लगभग सभी गांवों का शहरीकरण हो गया है। हर गांव के चौक-चौराहों पर सभी चीजों की दुकानें खुल गई है। अब तो गांवों में भी माॅल और बिग बाजार खुल रहे हैं। उस पर से एक नया कंसेप्ट ऑनलाइन मार्केटिंग जिसने कारोबार की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया है।
ऐसे हालात में ही मेला का पराभव शुरू हुआ। एक बड़ा कारण मेला के उजड़ने का यह भी है खेती-किसानी हाईटेक हो जाना। खेती के लिए मवेशियों की जरूरत लगभग खत्म हो गई है। ट्रेक्टर से लेकर खेती के लिए आधुनिक उपकरण उपलब्ध हो गये हैं। फसल की रोपाई,बोआई और कटाई सब मशीनों से होने लगा है।ऐसे हालात में किसानों ने बैल रखना छोड़ दिया है। हरदी मेला मुख्य रूप से बैलों के खरीद-बिक्री के लिए किसानों के आकर्षण का केंद्र था। ।
हरदी मेला के मौजूदा वारिसों में एक एस पी एन सिंह जो अमेरिका में रह रहे हैं ने बताया कि इस मेला की शुरुआत हमारे पूर्वजों ने 1901-1902 में कराया था।उस वक्त मेला का रकबा 125 एकड़ से ज्यादा में फैला था। पहले मेला में अंग्रेज अफसर,निलहा जमींदार अपने परिवार के साथ मेला घूमने आते थे। इस मेला में बिहार और बिहार के बाहर के किसान और मवेशी व्यापारी आते थे। अब मेला का रकबा भी कम हो गया है और व्यापारियों का आना भी।
इस विषय में हरदी मेला के मौजूदा वारिसों में एक अमिय राघव जो मुंबई में रहते हैं ने बताया कि मेला अभी भी लग रहा है। बैलों का कारोबार कम हुआ है लेकिन अभी भी मेला में अच्छे नस्ल का घोड़ा आता है, मेला के सीजन में अभी भी घोड़े का रेस होता है। फर्नीचर से लेकर अन्य सामानों की बिक्री अभी बहुत अच्छा होता है।
हरदी मेला में हुए एक घटना के विषय में ” सर्चलाईट ” अखबार पटना 18 मार्च 1921 के अंक में विस्तार से जिक्र मिलता है। उस वक्त हरदी मेला का इलाका पारू थाना क्षेत्र के अधिन था। घटना 14 फरवरी 1921 को शाम पांच बजे की है। एक निलहा जमींदार (नील की खेती करने वाला) एफ सी मन्स अपनी पत्नी क साथ मेला घूमने गया तब कुछ लोगों ने “महात्मा गांधी की जय” का नारा लगाने लगे जिससे वो नाराज़ होकर इस बात की शिकायत मुजफ्फरपुर एस पी और तिरहुत कमिश्नर से किया। तब मेला के मालिक कृष्ण प्रसाद नारायण सिंह से पत्र लिखकर नारा लगाने वाले का नाम पूछा गया कि। जिस पर उन्होंने खेद प्रकट करते हुए उचित कार्रवाई का वादा किया। उसके बावजूद मुजफ्फरपुर एस पी मि विल्सन मेला पहुंच कर गुस्सा में मेला मालिक को बुरा-भला कहा साथ ही मेला बन्द करा देने को कहा। मेला में मौजूद आम अवाम की भीड़ ने इस बात से नाराज़ होकर फिर से महात्मा गांधी की जय का नारा लगाने लगे। तब एस पी ने कई लोगों को पकड़ कर पारू थाना के दारोगा के सुपुर्द कर दिया। इसके बाद 19 फरवरी को मेला और उसके आसपास धारा 144 लगा दिया।
इस के बाद एस पी ने 50 गोरखा फौजियों के साथ मेला मालिक के घर का अतिक्रमण करने पहुंचे तब मेला मालिक कृष्ण प्रसाद नारायण सिंह के छोटे भाई बलदेव नारायण सिंह ने उन्हें रोका फिर यह लोग मेला लौट गए।
इस अपमानजनक घटना से नाराज़ होकर कृष्ण प्रसाद नारायण सिंह ने विधान परिषद की सदस्यता, अवैतनिक मजिस्ट्रेट का पद, जिला अभिषद की सदस्यता तथा चौकीदार युनियन के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया। इस घटनाक्रम का ब्योरा बिहार-उड़ीसा विधान परिषद की कार्यवाही,खंड -1, पृष्ठ 827-28 और 872 में दर्ज है। इन सब ब्योरा को एक जगह प्रो. के. के. दत्त की पुस्तक बिहार में स्वातंत्र्य आन्दोलन का इतिहास भाग -1 मे अंकित है।
हरदी मेला मालिकों के विषय में जानकारी रखने वाले लोगों का कहना है कि यह परिवार शुरू से ही स्वतंत्रता आंदोलन का समर्थक रहा जबकि अंग्रेजी हुकूमत के दौर में अधिकतर जमींदार सरकार के समर्थक होते थे।
हरदी मेला के पुराने वैभव को याद करते हुए हरदी-हरपुर गांव के मोहम्मद सोएब का कहना है कि पहले मेला में मनोरंजन के साधन नौटंकी और सर्कस होने के वजह से दिन और रात मेला में चहल-पहल लगा रहता था। डर-भय का कोई माहौल नहीं था,आस पास के गांव के लोग अपने बहू-बेटियों को मेला घुमाने ले जाते थे। उस वक्त मेला मालिकान खुद सब पर नज़र रखते थे, सबकी हिफाज़त करते थे। अब वो बात नहीं रही मेला मालिकान देश-विदेश में बस गए हैं, यहां मेला की जिम्मेदारी मुंशी मैनेजर के हवाले हैं।

साभार: आफाक़ आज़म










