मुजफ्फरपुर : बिहार में जाति प्रमाण पत्र और ईडब्ल्यूएस प्रमाण पत्र में ‘भूमिहार ब्राह्मण’ की जगह केवल ‘भूमिहार’ दर्ज किए जाने को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। “राष्ट्रीय भूमिहार ब्राह्मण परिषद” ने बिहार सरकार, सामान्य प्रशासन विभाग और शीर्ष प्रशासनिक अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा है कि सरकारी अभिलेखों में समुदाय की ऐतिहासिक पहचान को मिटाने में लगी है।
परिषद ने मुख्य सचिव और सामान्य प्रशासन विभाग को भेजे गए पत्र में दावा किया है कि भारतीय संविधान किसी भी प्राधिकरण को किसी समुदाय की ऐतिहासिक या सामाजिक पहचान उसकी सहमति के बिना बदलने का अधिकार नहीं देता। परिषद का आरोप है कि विभाग लगातार ऐसे जवाब दे रहा है जिन्हें वह “भ्रामक, तथ्यहीन और आधारहीन” मानता है।
परिषद के अनुसार, जब भी सरकार से सामान्य वर्ग की आधिकारिक जाति सूची मांगी गई, यह बताते हुए कि “भूमिहार ब्राह्मण” सूची में क्यों नहीं है, तब विभाग ने कोई स्पष्ट सूची उपलब्ध नहीं कराई। वहीं, परिषद का कहना है कि समुदाय से जुड़े आयोगों और ऐतिहासिक अभिलेखों से प्रमाण उपलब्ध कराने के बाद भी सामान्य प्रशासन विभाग ने कोई ठोस निर्णय नहीं लिया।
जब खबर जिन्दगी ने इस नाम की जाति की पड़ताल करनी प्रारंभ की तो इसका पहला ऐतिहासिक साक्ष्य सम्राट अशोक के प्राकृत भाषा और ब्राह्मी लिपि शिलालेख (लगभग 250 ईसा पूर्व) में “बाभन” शब्द का उल्लेख मिलता है, जिसे परिषद अपनी प्राचीन पहचान से जोड़ता है।
वहीं मध्यकालीन ताम्रपत्र और राजशाही अभिलेख: बेतिया, हथुआ, टिकारी और काशी राज सहित विभिन्न रियासतों के दस्तावेजों में “ब्राह्मण राजा” अथवा “जमींदार ब्राह्मण” के रूप में उल्लेख होने का दावा किया गया है।
ब्रिटिशकालीन जनगणना (1911 और 1931) के अनुसार इस समुदाय को “भूमिहार ब्राह्मण” के रूप में दर्ज किया गया था। वहीं फ्रांसिस बुकानन हैमिल्टन और मॉन्टगोमेरी मार्टिन की रिपोर्टों में “बाभन”, “मगही ब्राह्मण” और “भूमिहार ब्राह्मण” जैसे उल्लेख होने का दावा किया गया है।
राजस्व अभिलेख और जिला गजेटियर: बिहार और उत्तर प्रदेश के पुराने खतियान, जिला गजेटियर तथा भू-राजस्व रिकॉर्ड में “ब्राह्मण” शब्द के साथ समुदाय का उल्लेख होने की बात परिषद ने कही है।
परिषद ने यह भी आरोप लगाया कि 20 जुलाई 2026 को विभाग की ओर से भेजे गए पत्र में केवल इतना कहा गया कि मामला “उच्च स्तर पर अध्ययनाधीन” है, जबकि वर्षों से समुदाय इस मुद्दे के समाधान की मांग कर रहा है। संगठन का कहना है कि इसी कारण ईडब्ल्यूएस और अन्य प्रमाण पत्रों में “भूमिहार ब्राह्मण” के स्थान पर केवल “भूमिहार” दर्ज किया जा रहा है, जिससे समुदाय की ऐतिहासिक पहचान प्रभावित हो रही है।
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अपने पत्र में परिषद ने ब्रिटिशकालीन जनगणना रिपोर्ट, पुराने राजस्व अभिलेख, जिला गजेटियर तथा स्वामी सहजानंद सरस्वती की 1916 में प्रकाशित पुस्तक ‘भूमिहार ब्राह्मण परिचय’ का हवाला देते हुए दावा किया है कि विभिन्न ऐतिहासिक दस्तावेजों में “भूमिहार ब्राह्मण” नाम का उल्लेख मिलता है। परिषद ने यह भी कहा कि यदि सरकार के पास अलग प्रशासनिक आधार है तो उसे सार्वजनिक किया जाए।
परिषद ने बिहार सरकार से मांग की है कि सामान्य प्रशासन विभाग के पोर्टल पर “भूमिहार ब्राह्मण” नाम को अपलोड किया जाए ताकि भविष्य में जारी होने वाले ईडब्ल्यूएस और अन्य प्रमाण पत्रों में कथित त्रुटि समाप्त हो सके।
संगठन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार शीघ्र निर्णय नहीं लेती है तो वह लोकतांत्रिक तरीके से धरना-प्रदर्शन करेगा और आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय का दरवाजा भी खटखटाएगा।
वहीं बिहार सरकार पहले यह कह चुकी है कि वर्तमान प्रशासनिक सूची में “भूमिहार” नाम दर्ज है। इस विषय पर परिषद और सरकार के बीच मतभेद बना हुआ है तथा अंतिम निर्णय या न्यायिक आदेश की प्रतीक्षा है। जब सरकार की लिखित प्रतिक्रिया इस पर आएगी तो उस खबर को भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।









