नेपाल-बांग्लादेश के Gen Z आन्दोलन से कितना अलग था भारत में छात्रों का आंदोलन
नई दिल्ली। देश में हाल ही में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेतृत्व में हुए छात्र-युवा आंदोलन को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो गई है। इस आंदोलन की शुरुआत NEET पेपर लीक, परीक्षा प्रणाली में सुधार, युवाओं के रोजगार और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों पर केंद्रित था, लेकिन आंदोलन के अंतिम चरण में मंचों से दिए गए बयानों और विभिन्न राजनीतिक दलों की सक्रियता ने इसके स्वरूप पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जिस आंदोलन को युवाओं के अधिकारों और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के अभियान के रूप में देखा जा रहा था, वह धीरे-धीरे वैचारिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया। इसी कारण अब इसकी तुलना नेपाल और बांग्लादेश में हुए Gen Z आंदोलनों से भी की जा रही है।
युवाओं के मुद्दों से वैचारिक बहस तक
आलोचकों का आरोप है कि आंदोलन के दौरान कुछ मंचों से ऐसे भाषण दिए गए जिनका सीधा संबंध शिक्षा, रोजगार या परीक्षा सुधार से नहीं था। कुछ वक्ताओं के कथित बयानों में भगवान श्रीराम को लेकर विवादित टिप्पणियां, एक धर्म विशेष को श्रेष्ठ बताने वाले वक्तव्य तथा कुछ हिंदू संतों और धार्मिक परंपराओं की आलोचना शामिल रही। इन बयानों के बाद सोशल मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यह बहस तेज हो गई कि क्या आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक गया।
हालांकि आंदोलन से जुड़े सभी संगठनों या नेताओं ने ऐसे बयानों का समर्थन किया हो, इसकी पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इन घटनाओं ने आंदोलन के सार्वजनिक विमर्श को प्रभावित किया और इसके राजनीतिक स्वरूप पर चर्चा बढ़ गई।
विपक्षी दलों की मौजूदगी से बदला नैरेटिव?
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि आंदोलन के दौरान कई विपक्षी दलों के नेताओं और समर्थकों की प्रत्यक्ष या परोक्ष भागीदारी ने भी इसकी दिशा को प्रभावित किया। उनके अनुसार, जब किसी छात्र आंदोलन के मंच पर राजनीतिक बयान प्रमुख होने लगते हैं, तब मूल मुद्दे की जगह वैचारिक और चुनावी संदेश अधिक चर्चा में आ जाते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि इसी वजह से आंदोलन केवल शिक्षा सुधार तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राष्ट्रीय राजनीति, सांस्कृतिक पहचान और वैचारिक टकराव का विषय भी बन गया।
नेपाल और बांग्लादेश से क्यों हो रही तुलना?
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार एवं चाणक्य नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के छात्र अब्दाल आज़म का कहना है कि नेपाल, बांग्लादेश और भारत में युवाओं की राजनीतिक भागीदारी लगातार बढ़ रही है। सोशल मीडिया ने इस पीढ़ी को तेज़ी से संगठित होने और अपनी बात राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का प्रभावी माध्यम दिया है।
उनके अनुसार, नेपाल में बेरोजगारी, भ्रष्टाचार और शासन व्यवस्था के खिलाफ युवा आंदोलन ने सत्ता परिवर्तन का रास्ता तैयार किया। बांग्लादेश में आरक्षण नीति, बेरोजगारी और सरकारी कार्रवाई के विरोध ने व्यापक राजनीतिक बदलाव की भूमिका बनाई। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि तीनों देशों की राजनीतिक और सामाजिक परिस्थितियां अलग हैं, इसलिए इनके परिणामों की सीधी तुलना नहीं की जा सकती।
भारत में कैसे शुरू हुआ आंदोलन?
भारत में इस आंदोलन की पृष्ठभूमि तब बनी जब तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की एक टिप्पणी को लेकर सोशल मीडिया पर व्यापक प्रतिक्रिया हुई। बाद में उन्होंने अपनी टिप्पणी पर स्पष्टीकरण भी जारी किया। इसके बाद अभिजीत दीपके के नेतृत्व में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का गठन हुआ।
शुरुआत में संगठन को सीमित समर्थन मिला, लेकिन जैसे ही NEET का पेपर लीक हुआ इन्होंने उस पेपर लीक को प्रमुख मुद्दा बनाकर जंतर-मंतर पर धरना, प्रदर्शन और अनशन शुरू कर दिया, जिसके बाद यह आंदोलन राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। इसी आंदोलन से बाद के दिनों में सोनम वांगचुक जुड़े जिसके बाद बड़ी संख्या में छात्रों और युवाओं ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस अभियान का समर्थन किया।
संसद मार्च ने बदली आंदोलन की दिशा
इसी बीच सोनम वांगचुक ने शांतिपूर्ण संसद मार्च का कॉल दिया। लेकिन संसद मार्च के पहले ही दिल्ली पुलिस ने सोनम वांगचुक की गिरती स्वास्थ्य स्थिति के कारण को लेकर उन्हें धरना स्थल से हटाकर दिल्ली के अस्पताल में भर्ती कराया। जहां उनके और सरकार के बीच की सहमति बन गई। लेकिन इसी बीच छात्रों के बीच खेल कर दिया गया, और संसद मार्च के दौरान कानून व्यवस्था ऐसी बिगड़ी कि तथाकथित आंदोलनकारी छात्रों ने पुलिस पर हमला कर दिया और यह शांति पूर्ण आंदोलन लड़ाई के अखाड़े में तब्दील हो गया। लगभग 250 पुलिस वालों को गंभीर चोटें आयीं। कुछ छात्र भी घायल हुए।
न्यूज 18 की रिपोर्ट की माने तो इस आंदोलन में 101 हत्या के मामलों के दोषी, जबकि 62 लोग हत्या की कोशिश के मामलों में नामजद शामिल अपराधी थे। वहीं 284 लूट और चोरी में नामजद अपराधी, 229 आर्म्स एक्ट के मामलों सहित अन्य मामले जिसमें rape और rape की कोशिश करने वाले यानी कुल मिलाकर 989 संदिग्ध लोगों की पहचान की गई है।
सरकार ने मांगे मानी, शिक्षा मंत्री ने दिया इस्तीफा
आंदोलन के बाद केंद्र सरकार ने आंदोलनकारियों की कई प्रमुख मांगें स्वीकार कीं। इसके बाद केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और उसके बाद आंदोलन समाप्त करने की घोषणा की गई। इस घटनाक्रम ने देश की राजनीति में छात्र आंदोलनों की भूमिका को लेकर नई बहस छेड़ दी।
क्या भारत में भी बनेगी नई राजनीतिक ताकत?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेपाल और बांग्लादेश की तरह भारत का यह Gen Z आंदोलन भी भविष्य में एक नई राजनीतिक शक्ति के रूप में सामने आएगा या फिर यह केवल एक मुद्दा-आधारित छात्र आंदोलन बनकर रह जाएगा।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि आने वाले वर्षों में ही इसका जवाब मिलेगा। हालांकि आंदोलन के बाद इस आंदोलन को प्रायोजित करने अमेरिका से आने वाले अभिजीत दीपके का यह बयान “झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए” इस बात का संकेत माना जा रहा है कि आंदोलन का नेतृत्व भविष्य में भी सार्वजनिक और राजनीतिक भूमिका निभाने की तैयारी में है।









