
अमेरिका ने पहली बार अंतरिक्ष में ‘ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ स्थापित करने की पुष्टि की है। चीन और रूस ने अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ पर चिंता जताई। जानिए भारत की अंतरिक्ष क्षमता और मिशन शक्ति के बारे में।
नई दिल्ली/खबर जिन्दगी: अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से पहली बार पुष्टि की है कि उसने अंतरिक्ष में ‘ऑन-ऑर्बिट स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ तैनात किया हैं। जिसके बाद अंतरिक्ष में सैन्य गतिविधियों को लेकर एक बार फिर वैश्विक चर्चा तेज हो गई है। हालांकि अमेरिकी वायुसेना के सचिव ट्रॉय मिंक ने एक सम्मेलन में कहा कि ये क्षमताएं अमेरिकी ने अपनी रक्षा के लिए तैनात किया है। जिसके बाद रूस-चीन ने अमेरिका के इस कृत्य पर चिंता जाहिर की है।
अमेरिकी स्पेस फोर्स के अनुसार, ‘स्पेस कंट्रोल’ में ऐसे काइनेटिक और नॉन-काइनेटिक तरीके शामिल हो सकते हैं, जिनसे किसी प्रतिद्वंद्वी की अंतरिक्ष संबंधी क्षमताओं को प्रभावित किया जा सके। अमेरिका के इस स्वीकृति के बाद यह स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहा है कि अब अंतरिक्ष भी लड़ाई का मैदान बन सकता है।
चीन ने जताई आपत्ति
अमेरिका की घोषणा के बाद चीन ने अमेरिका के इस कृत्य पर अपनी आपत्ति जताई है। चीन का कहना है कि इसके कारण अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ बढ़ सकती है। चीन की तरफ से कहा गया है कि अंतरिक्ष को युद्ध का मैदान बनाने और वहां हथियारों की प्रतिस्पर्धा बढ़ाने से बचना चाहिए।
आपको एक बात यहां बता दें कि चीन और अमेरिका के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में कड़ी प्रतिस्पर्धा पहले से चल रही है। दोनों देश सैन्य संचार, निगरानी, उपग्रह सुरक्षा और काउंटर-स्पेस क्षमताओं पर लगातार काम कर रहे हैं।
रूस ने भी उठाए सवाल
रूस ने भी अमेरिका की घोषणा के बाद अपनी प्रतिक्रिया दी है। रूसी अधिकारियों ने अंतरिक्ष में हथियारों की तैनाती से मुक्त रखने की वकालत की है। मॉस्को की ओर से अंतरिक्ष को सैन्यीकरण से दूर रखने को लेकर अंतरराष्ट्रीय सहयोग की आवश्यकता बताई गई है।
इस घटनाक्रम से अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा को लेकर पुरानी चिंताएं फिर चर्चा में आ गई हैं। जब दुनिया के सामने यह परोसा जा रहा था कि अमेरिका और सोवियत संघ ने अंतरिक्ष में सैन्य हथियार तैनात किए हुए हैं।
अमेरिका का ‘ऑन-ऑर्बिट’ हथियार कितना खतरनाक
अमेरिका ने जिन ‘ऑन-ऑर्बिट’ हथियारों की पुष्टि की है, उनकी तकनीकी क्षमता के बारे में अभी बहुत कम जानकारी ही उपलब्ध है। अमेरिकी अधिकारियों ने अब तक यह सार्वजनिक नहीं किया है कि यह हथियार कितना खतरनाक हो सकता है। हथियारों का मॉडल या उनकी क्षमता पर कोई बात नहीं बताई है।
‘स्पेस कंट्रोल’ शब्द व्यापक है और इसमें प्रतिद्वंद्वी की अंतरिक्ष क्षमताओं को प्रभावित करने वाली अलग-अलग तकनीकें शामिल हो सकती हैं। विशेषज्ञों और मीडिया रिपोर्टों में जैमिंग जैसी नॉन-काइनेटिक क्षमताओं से लेकर अन्य काउंटर-स्पेस तकनीकों की संभावनाओं पर चर्चा की गई है।
अंतरिक्ष में हथियारों का इतिहास
अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा नई नहीं है। 1957 में सोवियत संघ के स्पुतनिक-1 के प्रक्षेपण के बाद अमेरिका और सोवियत संघ के बीच अंतरिक्ष तकनीक को लेकर प्रतिस्पर्धा तेज हुई थी। जो बाद में समय के साथ उपग्रह सैन्य संचार, नेविगेशन, निगरानी और मिसाइल चेतावनी जैसी महत्वपूर्ण प्रणालियों का हिस्सा बन गए।
इसी को देखते हुए दुनियां के देशों के बीच 1967 में Outer Space Treaty लागू किया गया। इस Treaty के माध्यम से अंतरिक्ष में सामूहिक विनाश के हथियारों की तैनाती को प्रतिबंधित किया गया। हालांकि, यह संधि अंतरिक्ष में हर प्रकार के पारंपरिक हथियारों पर व्यापक प्रतिबंध नहीं लगाती। क्यों कि तब तक हथियारों की इतनी प्रकृति मौजूद नहीं थी।
भारत का इस तरह की दौड़ में स्थान
भारत ने भी 27 मार्च 2019 को मिशन शक्ति के तहत एंटी-सैटेलाइट (ASAT) मिसाइल परीक्षण किया था। इस परीक्षण से भारत ने लो-अर्थ ऑर्बिट में अपने एक उपग्रह को सफलतापूर्वक नष्ट किया गया था। विदेश मंत्रालय के अनुसार, यह परीक्षण DRDO ने किया था और इसके साथ भारत ने अंतरिक्ष में उपग्रह को इंटरसेप्ट करने की स्वदेशी क्षमता प्रदर्शित की।
इस परीक्षण के बाद भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद चौथे देश के रूप में उन देशों के समूह में शामिल हुआ, जिन्होंने एंटी-सैटेलाइट क्षमता का सफल प्रदर्शन किया है। भारत सरकार ने तब यह स्पष्ट रूप से कहा था कि मिशन शक्ति का उद्देश्य केवल अंतरिक्ष सेटेलाइट के खतरों के खिलाफ प्रतिरोधक क्षमता विकसित करना था।
भारत का विश्व को लेकर रुख?
मिशन शक्ति के बाद भारत ने अंतरिक्ष में हथियारों की होड़ को रोकने से संबंधित अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का समर्थन जारी रखने की बात कही थी। भारत ने तब भी अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को रोकने के मुद्दे पर Prevention of an Arms Race in Outer Space (PAROS) का समर्थन किया था।
भारत का “मिशन शक्ति” अपनी अंतरिक्ष और राष्ट्रीय सुरक्षा क्षमताओं को मजबूत करना था। वहीं वहीं दूसरी तरफ अंतरिक्ष में हथियारों की दौड़ को नियंत्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमों और सहयोग की आवश्यकता पर भी जोर देता रहा है।
अमेरिका का कबूलनामा कितना महत्वपूर्ण
अभी अमेरिका, चीन और रूस के बीच अंतरिक्ष क्षेत्र में रणनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है। इस समय में अमेरिका की ओर से कक्षा में तैनात ‘स्पेस कंट्रोल वेपन्स’ की यह घोषणा अंतरिक्ष सुरक्षा, उपग्रहों की सुरक्षा और भविष्य में संभावित अंतरिक्ष हथियारों की प्रतिस्पर्धा को लेकर नई बहस को जन्म दे सकती है। विशेषज्ञों ने भी इस घटनाक्रम के बाद अंतरिक्ष में सैन्य प्रतिस्पर्धा बढ़ने की आशंका जताई है।










