मुजफ्फरपुर, बिहार। मुजफ्फरपुर जिले के कुशी पोखरैरा गांव से एक ऐसी कहानी सामने आई है जिसने पूरे इलाके की आंखें नम कर दी हैं। यह सिर्फ एक व्यक्ति के घर लौटने की कहानी नहीं, बल्कि उम्मीद, विश्वास और परिवार के अटूट रिश्तों की मिसाल है।
करीब 41 वर्षों बाद स्वर्गीय राम खेलावन मिश्रा के बड़े पुत्र उमेश मिश्रा अपने पैतृक घर लौटे। जिस बेटे के बारे में गांव के अधिकांश लोगों ने मान लिया था कि अब वह इस दुनिया में नहीं है, वह अचानक घर की चौखट पर खड़ा था। उसे देखते ही परिवार की वर्षों पुरानी पीड़ा खुशी के आंसुओं में बदल गई।
परिजनों के अनुसार, किशोरावस्था में ही पत्नी के निधन का गहरा सदमा उमेश मिश्रा सहन नहीं कर सके। मानसिक रूप से परेशान रहने लगे और लगभग 14 वर्ष की उम्र में घर छोड़कर निकल गए। इसके बाद उनका कोई पता नहीं चला। इस दौरान उनके पिता का निधन हो गया। मां तो पहले ही दुनिया छोड़ चुकी थीं, जब सबसे छोटा भाई वीरेंद्र मिश्रा महज आठ महीने का था।
घर छोड़ने के बाद उमेश मिश्रा भटकते-भटकते असम पहुंचे, जहां एक लकड़ी ठेकेदार के यहां काम किया। बाद में वे गुजरात चले गए। बताया जाता है कि पिछले करीब 15 महीनों से वे बार-बार अपने गांव और परिवार को याद करते थे और घर लौटने की इच्छा जाहिर करते थे। आखिरकार गया जिले के एक व्यक्ति ने उनकी मदद की और उन्हें उनके गांव कुशी पोखरैरा पहुंचाया।
उमेश मिश्रा के परिवार में तीन भाई और एक बहन हैं। समय के साथ दोनों छोटे भाई अलग-अलग रहने लगे। छोटे भाई वीरेंद्र मिश्रा पेड़ से गिरने के कारण कमर की गंभीर समस्या से जूझ रहे हैं। अब वे खेती-बाड़ी और गायों की सेवा कर अपना जीवन बिताते हैं। वहीं मंझले भाई दिनेश मिश्रा पूजा-पाठ कराते हैं और घर पर एक छोटी-सी दुकान चलाकर परिवार का भरण-पोषण करते हैं।
मंझले भाई दिनेश मिश्रा बताते हैं कि वर्षों तक गांव के लोग कहते रहे कि अब उमेश नहीं रहे, उनका श्राद्ध कर देना चाहिए। लेकिन छोटे भाई वीरेंद्र मिश्रा (सिक्किम मिश्रा) हर बार एक ही बात कहते थे—“मेरा भाई एक दिन जरूर लौटेगा। जब तक उसके निधन की पक्की खबर नहीं है, हम उसका श्राद्ध नहीं करेंगे।”
वीरेंद्र की पत्नी भी बताती हैं कि उनकी शादी को 32 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान कई लोगों ने उन्हें भी श्राद्ध करने की सलाह दी, लेकिन परिवार ने हमेशा इंतजार का रास्ता चुना। उनका कहना था कि जब तक अपनी आंखों से कुछ न देख लें, तब तक बड़े भाई को मृत कैसे मान लें।
और फिर वह दिन आया, जब 41 साल बाद उमेश मिश्रा अपने घर लौट आए। वर्षों से सूना पड़ा आंगन खुशियों से भर गया। परिजन फूट-फूटकर रो पड़े, गांव के लोग उमड़ पड़े और पूरे इलाके में यही चर्चा होने लगी कि अगर विश्वास सच्चा हो तो भगवान भी बिछड़ों को उनकी मिट्टी तक वापस पहुंचा देते हैं। आज उमेश मिश्र की उम्र 55 वर्ष हो चुकी है। चेहरा, मोहरा सब बदल गया लेकिन जो नहीं बदली वह थी याददाश्त जिसने इन्हें इनके परिजनों से दुबारा मिलवाया।
यह कहानी केवल एक परिवार के पुनर्मिलन की नहीं, बल्कि उस उम्मीद की है जिसने चार दशक से भी अधिक समय तक हार नहीं मानी।









