
उमेश कांत गिरी, ब्यूरो प्रमुख. घाटशिला. झारखंड.
घाटशिला/खबर जिन्दगी: सोना देवी विश्वविद्यालय के स्वामी विवेकानंद सभागार में बौद्ध अध्ययन के अंतर्गत “बौद्ध अध्ययन में मंत्र-जप का महत्व” विषय पर विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्देश्य विद्यार्थियों और शिक्षकों को बौद्ध दर्शन, मंत्र-जप, ध्यान, एकाग्रता, करुणा, मैत्री और आत्म-अनुशासन जैसे विषयों से परिचित कराना था।

कार्यक्रम में वक्ताओं ने बौद्ध दर्शन के धार्मिक पक्ष के साथ-साथ उसके दार्शनिक, नैतिक, मानसिक और सामाजिक आयामों पर चर्चा की। वक्ताओं के अनुसार, वर्तमान तेज जीवनशैली में एकाग्रता, धैर्य, आत्म-संयम और सकारात्मक चिंतन जैसे विषयों पर विचार करना विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हो सकता है।

वैदिक मंत्र एकाग्रता और आत्म-अनुशासन का केंद्र
कार्यक्रम का संचालन सहायक कुलसचिव श्रीमती अर्चना सिंह ने किया। उन्होंने विषय की रूपरेखा प्रस्तुत करते हुए कहा कि बौद्ध अध्ययन में मंत्र-जप केवल धार्मिक अनुष्ठान है। यह चित्त की एकाग्रता, ध्यान और आत्म-अनुशासन का केंद्र है। मंत्र की पुनरावृत्ति के दौरान सजगता और एकाग्रता बनाए रखने का अभ्यास व्यक्ति को वर्तमान क्षण पर ध्यान केंद्रित करने में मदद कर सकता है।
मोन्क डॉ. चन्द्रकित ने मंत्रोच्चारण का बताया प्रभाव
मुख्य वक्ता मोन्क डॉ. चन्द्रकित, विभागाध्यक्ष, बौद्ध अध्ययन विभाग, स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय, मेरठ ने बौद्ध दर्शन और मंत्र-जप के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से जानकारी दी।
उन्होंने मंत्रोच्चारण मंत्र-जप की प्रक्रिया के माध्यम से विद्यार्थियों और शिक्षकों को एकाग्रता, ध्यान, सकारात्मक चिंतन और आत्म-जागरूकता से जुड़े पहलुओं को समझाया। उन्होंने मंत्र-जप को केवल शब्दों की यांत्रिक पुनरावृत्ति के रूप में नहीं देखने की बात कही।

उन्होंने उदाहरण के रूप में “ॐ मणि पद्मे हूँ” मंत्र का उल्लेख करते हुए बताया कि तिब्बती बौद्ध परंपरा में इसे अवलोकितेश्वर की करुणा से संबद्ध माना जाता है। उन्होंने यह भी बताया कि विभिन्न बौद्ध परंपराओं में मंत्रों की भूमिका अलग-अलग रूपों में दिखाई देती है।
कुलपति ने मुख्य वक्ता को किया सम्मानित
कार्यक्रम के दौरान कुलपति प्रो. डॉ. ब्रज मोहन पाट पिंगुवा ने मुख्य वक्ता मोन्क डॉ. चन्द्रकित को सम्मानित किया। कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को विभिन्न ज्ञान-परंपराओं, दर्शन और चिंतन धाराओं से परिचित कराने के लिए शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
उन्होंने कहा बौद्ध दर्शन भारतीय दार्शनिक परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसके अध्ययन से विद्यार्थियों को विभिन्न दृष्टिकोणों को समझने तथा चिंतन की व्यापकता विकसित करने का अवसर मिलता है।
जी. एम. वानखेड़े को भी किया गया सम्मानित
कार्यक्रम में जी. एम. वानखेड़े, सेवानिवृत्त प्रबंधक, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, नागपुर की भी उपस्थिति रही। राजनीति विज्ञान विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. शिवचन्द्र झा ने श्री जी. एम. वानखेड़े को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया। उन्होंने विद्यार्थियों और विश्वविद्यालय परिवार का उत्साहवर्धन किया। डॉ. झा ने कहा कि अनुभवी एवं वरिष्ठ व्यक्तित्वों की शैक्षणिक कार्यक्रमों में सहभागिता विद्यार्थियों को उनके अनुभवों से सीखने का अवसर देती है।

शिक्षा के साथ मानसिक और नैतिक विकास जरूरी
कुलसचिव डॉ. नीत नयना ने कहा कि विश्वविद्यालय केवल पाठ्यक्रम आधारित शिक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों के समग्र व्यक्तित्व विकास का भी ध्यान रखता है। उन्होंने कहा कि ध्यान, आत्म-अनुशासन, सकारात्मक चिंतन और मानवीय मूल्य विद्यार्थियों को संतुलित दृष्टिकोण विकसित करने में सहायक होते हैं। उन्होंने विद्यार्थियों से ज्ञान को केवल परीक्षा और डिग्री तक सीमित न रख, जीवन-मूल्यों और व्यवहार से जोड़ने का आग्रह किया।
“विद्यार्थी ज्ञान को जीवन से जोड़ें”- प्रभाकर सिंह कुलाधिपति

कुलाधिपति श्री प्रभाकर सिंह ने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र या डिग्री हासिल करना नहीं, बल्कि ज्ञान, विवेक, अनुशासन, संवेदना और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास करना भी है।
उन्होंने कहा कि तकनीकी और भौतिक विकास के साथ मानसिक शांति और मानवीय संवेदनाओं पर भी ध्यान देना आवश्यक है। उन्होंने विद्यार्थियों से भारतीय दर्शन और ज्ञान परंपराओं का अध्ययन जिज्ञासा, तर्क और खुले मन से करने का आह्वान किया साथही राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने की अपील की।
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के विभिन्न संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष, शिक्षक, कर्मचारी और बड़ी संख्या में छात्र-छात्राएं उपस्थित रहे। कार्यक्रम का समापन ज्ञान, शांति, करुणा, सकारात्मक चिंतन और आत्म-अनुशासन के संदेश के साथ हुआ।










