मुजफ्फरपुर जिले की शान मोतीपुर चीनी मिल और बटलर खाक.. सरकारों ने निगला रौनक

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मोतीपुर चीनी मिल खत्म जरूर हो गया लेकिन “नो वेकेंसी नो एडमिशन” बोर्ड आज भी उस शान की गवाही बन का खड़ा है। 1466 एकड़ में फैला यह मिल शायद अपनी उजड़ी दुनिया को वापस पाने की आस जोह रहा है

हेडलाइन पढ़कर आपकी भी पुरानी यादें ताजा हो गई होंगी। चीनी मिलो का गन्ना पेड़ाई और चीनी बनाने का तब एक समय हुआ करता था जो अक्टूबर से शुरू होकर मार्च तक खत्म हो जाता था। बहुत चहल पहल रहा करती थी उस जगह पर जो सकारात्मक ऊर्जा का श्रोत था।

यहां एक छोटी सी जानकारी हम आपको दे दें कि यूनाइटेड किंगडम के फूल कन्वर्सेशन नाम मीडिया आउटलेटलेन नेवेक्क ने प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट अ हिस्ट्री ऑफ शुगर-ड फूड नोबडी नीड्स बट एवरीवन क्रेब्स’ के मुताबिक भारत में लगभग 2500 साल से चीनी का इस्तेमाल होता रहा है। लेकिन सेहत पर इसके दूसप्रभाव के कारण इसकी जगह खांड और गुड़ ले लिया जिसका प्रमाण आयुर्वेदिक ग्रंथ चरक संहिता में गन्ना से गुड़ और शक्कर बनाने की जानकारी दी गई है। इसके अलावा कोटिल्य के अर्थशास्त्र में गुड़ और खांड समेत पांच तरह के शकर का वर्णन मिलता है।

अब मोतीपुर चीनी मिल पर वापस आते हैं। मुजफ्फरपुर जिले के मोतीपुर में 1932-33 में स्थापित किया गया था। कोलकाता के व्यवसाई सेठ अब्दुर्रहीम उसमान ने स्थापित किया था। उनके मौजूदा वारिस गुलाम सर्फुद्दीन उसमान ने बताया कि मोतीपुर चीनी मिल से उत्पादित चीनी अपने बेहतर क्वालिटी के वजह से इलैंड तक जाता था। यहां की चीनी कलकत्ता के सभी बड़े मिठाई दुकानों में इस्तेमाल होती थी। इस चीनी मिल की वजह से हजारों लोगों को रोजगार मिला और इस इलाके के गन्ना किसानों को नगद आमदनी होती थी। लेकिन विदेशों औद्योगिकरण के कारण यहां से चीनी का निर्यात बंद हो गया जिसके बाद बिहार के निजी चीनी मिल की हालत खराब होने लगी और घाटे में चलने लगा।

तब बिहार सरकार ने शुगर उद्योग अधिनियम 1977 के तहत 1980-81 में इस चीनी मिल को सरकार ने अधिग्रहण कर लिया। सरकार इस जैसे कई चीनी मिल को चला नहीं पाई और 1997 में सारे चीनी मिल बंद हो गए। नरेंद्र मोदी ने 2014 के चुनाव में मोतीपुर की जनसभा में कहा था कि अगली बार जब हम आयेंगे तो मोतीपुर के चीनी मिल के चीनी की चाय पियेंगे। लेकिन लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अगली बार बिहार विधानसभा चुनाव के समय मोदी मोतीपुर आए जरूर, लेकिन मोतीपुर चीनी मिल का जिक्र तक नहीं किया। हर चुनाव के समय इस चीनी मिल को पुनर्जीवित करने का आश्वासन दिया जाता है लेकिन यह आश्वासन आज तक पूरा नहीं हुआ।

मोतीपुर चीनी मिल की कहानी अभी बाकी है जो कल के अगला अंक में जो इससे भी अधिक रोचक और जानकारी से भरपूर है।

Sandeepak Kumar
Author: Sandeepak Kumar

संदीपक कुमार, पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 साल से अधिक का अनुभव। ई टीवी से कैरियर की शुरुआत की। महुआ, कशिश न्यूज़,न्यूज 29 जैसे चैनल में बतौर पैनल प्रोड्यूसर और पीसीआर हेड के तौर पर काम किया। रायपुर आईबीसी 24, चंडीगढ़ न्यूज 18 में सीनियर प्रोड्यूसर कार्यरत रहे। कंटेंट डिजायनर के साथ ही स्क्रिप्ट राइटिंग, पैनलिंग और डिजिटल में कार्य का भी अनुभव रहा है।

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