मुजफ्फरपुर | आफाक आजम की विशेष रिपोर्ट
देश जब आज़ादी के अमृतकाल में अपने स्वतंत्रता सेनानियों को याद कर रहा है, तब मुजफ्फरपुर के इतिहास से जुड़ा एक बड़ा सवाल फिर चर्चा में है—क्या शहीद प्रफुल्ल चाकी को वह सम्मान मिला जिसके वे वास्तविक हकदार थे?
1908 के ऐतिहासिक मुजफ्फरपुर बम कांड के दो प्रमुख क्रांतिकारी थे खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी। दोनों ने ब्रिटिश जज किंग्सफोर्ड को निशाना बनाने के लिए अपने प्राणों की बाजी लगा दी। घटना के बाद दोनों ने अलग-अलग रास्ता अपनाया। 1 मई 1908 को गिरफ्तारी से बचने के लिए प्रफुल्ल चाकी ने स्वयं को गोली मारकर बलिदान दे दिया, जबकि 11 अगस्त 1908 को खुदीराम बोस को अंग्रेजों ने फांसी दे दी।
आज स्थिति यह है कि मुजफ्फरपुर में खुदीराम बोस के नाम पर रेलवे स्टेशन, खेल मैदान, स्मारक स्थल और हर वर्ष जिला प्रशासन की ओर से शहादत दिवस का आयोजन होता है। वहीं, प्रफुल्ल चाकी के नाम पर केवल एक स्मारक और वर्ष 2010 में जारी एक डाक टिकट ही उनकी पहचान बनकर रह गए हैं। जिला प्रशासन की ओर से उनके शहादत दिवस पर कोई आधिकारिक कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जाता।
इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह उपेक्षा केवल प्रफुल्ल चाकी तक सीमित नहीं है। 1857 से 1947 के बीच देश के लिए बलिदान देने वाले अनेक क्रांतिकारी आज भी सरकारी सम्मान और जनस्मृति से दूर हैं। बिहार के पहले शहीद वारिस अली, जूवा सहनी के सहयोगी बागू सहनी समेत कई नाम आज भी व्यापक पहचान की प्रतीक्षा में हैं।
गैर-राजनीतिक संगठन ‘संकल्प’ पिछले 25 वर्षों से ऐसे भूले-बिसरे शहीदों को सम्मान दिलाने की मुहिम चला रहा है। संगठन के प्रयासों से ही वारिस अली को भारत के प्रथम शहीदों में मान्यता दिलाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता मिली।
विशेष बात यह भी है कि खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चाकी, दोनों बंगाल के निवासी थे, लेकिन उनके बलिदान ने मुजफ्फरपुर को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्थायी पहचान दिलाई। जब भी क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास लिखा जाएगा, मुजफ्फरपुर का नाम इन दोनों वीरों के साथ हमेशा जुड़ा रहेगा।
आज आवश्यकता इस बात की है कि स्वतंत्रता संग्राम के सभी नायकों को समान सम्मान मिले। इतिहास केवल कुछ नामों तक सीमित न रहे, बल्कि उन सभी शहीदों के योगदान को भी याद किया जाए जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर 11 अगस्त को खुदीराम बोस का शहादत दिवस सरकारी स्तर पर मनाया जाता है, तो फिर 1 मई को शहीद प्रफुल्ल चाकी की शहादत को वही सम्मान क्यों नहीं मिलता?










