घाटशिला में शिक्षाविद कुंदन कुमार सिंह को हजारों लोगों ने दी अंतिम विदाई, तीनों बेटियों ने निभाई अंतिम यात्रा की पूरी रस्में..
उमेश कांत गिरि ब्यूरो प्रमुख घाटशिला झारखंड घाटशिला झारखंड: कुछ दृश्य सिर्फ आंखों से ही नहीं, दिल से भी देखे जाते हैं। झारखंड के घाटशिला स्थित मऊभंडार मुक्तिधाम में ऐसा ही एक भावुक पल देखने को मिला, जिसने न केवल हजारों लोगों की आंखें नम कर दीं, बल्कि समाज को एक नई सोच भी दे गया।

क्षेत्र के प्रख्यात शिक्षाविद, गिरिश चंद्र झुरो देवी उच्च विद्यालय सह इंटर कॉलेज के संस्थापक और शिक्षा के “पुरोधा” स्वर्गीय कुंदन कुमार सिंह की अंतिम यात्रा में उनकी तीनों बेटियों ने वह कर दिखाया, जिसे लंबे समय तक समाज की परंपराओं और पुरातन सोच ने बेटियों से दूर रखा था।

स्वर्गीय कुंदन कुमार सिंह की अंतिम इच्छा थी कि उनकी तीनों बेटियां ही उनके अंतिम संस्कार की सारी रस्में पूरी करें। परिवार ने भी इस इच्छा का सम्मान किया। बड़ी बेटी पूनम सिंह, शिक्षिका अल्पना सिंह और हाल ही में बिहार सरकार में सप्लाई इंस्पेक्टर पद पर चयनित ज्योति कुमारी (ज्योति सिंह) ने अपने पिता की अर्थी को कंधा दिया। इसके बाद बड़ी बेटी पूनम सिंह ने पूरे वैदिक विधि-विधान और मंत्रोच्चार के बीच अपने पिता को मुखाग्नि देकर अंतिम संस्कार की रस्म पूरी की।

श्मशान घाट पर मौजूद हजारों लोगों के लिए यह पल केवल एक अंतिम संस्कार नहीं, बल्कि समाज और सोंच में हो रहे बदलाव का जीवंत संदेश बन गया। लोगों के भाव ग़मगीन थे और आंखे नम थी, लेकिन उन नम में गर्व भी था। हर कोई यही कहता नजर आया—”जब बेटियां हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, तो अपने पिता को अंतिम विदाई देने का अधिकार उनसे क्यों छीन लिया जाए?”
यह दृश्य उन सदियों पुरानी रूढ़ियों पर सवाल भी था, जिनमें अंतिम संस्कार का अधिकार केवल बेटों तक ही सीमित माना जाता था। स्वर्गीय कुंदन कुमार सिंह की बेटियों ने साबित कर दिया कि कर्तव्य, संस्कार और जिम्मेदारी का कोई लिंग नहीं होता।
अंतिम संस्कार से पहले मुसाबनी स्थित विद्यालय परिसर में उनके पार्थिव शरीर को अंतिम दर्शन के लिए रखा गया। यहां शिक्षकों, कर्मचारियों, विद्यार्थियों और सैकड़ों शुभचिंतकों ने दो मिनट का मौन रखकर अपने प्रिय गुरु, मार्गदर्शक और संस्थापक को भावभीनी श्रद्धांजलि दी। विद्यालय परिसर में छात्रों का सिसकना, शिक्षकों की नम आंखें और आम लोगों की भीड़ इस बात की गवाही दे रही थी कि एक शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षा का एक युग विदा हो रहा है।

करीब 45 वर्षों तक आदिवासी बहुल क्षेत्र में शिक्षा की अलख जगाने वाले कुंदन कुमार सिंह ने हजारों विद्यार्थियों का भविष्य संवारने का काम किया। उनके निधन को पूरे क्षेत्र ने शिक्षा जगत की अपूरणीय क्षति बताया।
मऊभंडार मुक्तिधाम में अंतिम यात्रा के दौरान समाज के हर वर्ग के लोग मौजूद रहे। पूर्व विधायक डॉ. प्रदीप कुमार बलमुचू, कांग्रेस प्रदेश सचिव तापस चटर्जी, विभिन्न सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि, शिक्षाविद, जनप्रतिनिधि, ग्रामीण और हजारों छात्र-छात्राओं ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें अंतिम विदाई दी।
यह अंतिम यात्रा केवल एक शिक्षाविद की विदाई नहीं थी, बल्कि समाज के लिए एक संदेश का एक ऐसा बीज बो गया, जो आने वाली पीढ़ियों को बदलाव के इस बयार को याद दिलाएगी कि बेटियां सिर्फ परिवार का सहारा नहीं, बल्कि हर जिम्मेदारी को पूरे सम्मान, साहस और संस्कार के साथ निभाने की माद्दा भी रखती हैं।









