
बिहार में आरटीआई के तहत किसी समस्या का समाधान जानने के लिए करना पड़ता है बार बार अपील
मुजफ्फरपुर/पटना/खबर जिन्दगी: सूचना का अधिकार(RTI) कानून सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। लेकिन अब इसी कानून के क्रियान्वयन की निगरानी करने वाली व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। मुजफ्फरपुर के मीनापुर निवासी आरटीआई एक्टिविस्ट अमरेन्द्र कुमार की शिकायत के जवाब में बिहार सूचना आयोग ने 17 अगस्त 2026 को जो स्थिति बताई, उसने लंबित वार्षिक रिपोर्टों को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
आयोग के अनुसार वर्ष 2021-22 की वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित हो चुकी है। 2022-23, 2023-24 और 2024-25 की रिपोर्टें अभी अंतिम संकलन के दौर में हैं। वहीं 2025-26 की रिपोर्ट भी संकलित की जा रही है। ऐसे में वर्ष 2026-27 शुरू हो जाने के बावजूद कई वर्षों की वार्षिक रिपोर्टों का लंबित रहना आरटीआई कानून की धारा 25 के अनुपालन पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
धारा 25 में क्या है व्यवस्था?
आरटीआई अधिनियम की धारा 25 के तहत सूचना आयोग को कानून के क्रियान्वयन से संबंधित वार्षिक रिपोर्ट तैयार कर सरकार को भेजनी होती है। इन रिपोर्टों में आरटीआई आवेदनों, अपीलों, लंबित मामलों और कानून के अनुपालन से जुड़े महत्वपूर्ण आंकड़ों की तस्वीर सामने आनी चाहिए।
यही वजह है कि वर्षों तक रिपोर्टों का अंतिम रूप से सार्वजनिक न होना केवल प्रशासनिक देरी का मामला नहीं माना जा सकता। इससे यह सवाल भी उठता है कि आरटीआई व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आधिकारिक और वर्षवार आकलन आखिर कब सामने आएगा।
आंकड़े नहीं मिले तो जिम्मेदार कौन?
आरटीआई एक्टिविस्ट ने आयोग के जवाब के आधार पर कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि विभिन्न विभागों और लोक प्राधिकारियों से समय पर आंकड़े उपलब्ध नहीं कराए गए तो इसके लिए जिम्मेदारी किसकी तय की गई? क्या संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई? किन-किन लोक सूचना पदाधिकारियों के विरुद्ध कार्रवाई की गई? दूसरी ओर, यदि आवश्यक आंकड़े उपलब्ध थे तो फिर वार्षिक रिपोर्टों को अंतिम रूप देने में वर्षों की देरी क्यों हुई—यह भी स्पष्ट किया जाना चाहिए।
5-6 साल तक सूचना का इंतजार क्यों?
आरटीआई एक्टिविस्ट ने दावा किया है कि कई मामलों में आरटीआई के तहत मांगी गई सूचना प्राप्त करने में 5 से 6 वर्ष तक का समय लग रहा है। साथ ही ये सवाल भी उठाया है कि जब आम नागरिक को सूचना पाने के लिए वर्षों तक इंतजार करना पड़े, तो आरटीआई कानून की पारदर्शिता और जवाबदेही की मूल भावना पर करारा प्रहार है।
सरकार और आयोग से उठी कई मांगें
RTI सरकार से लंबित वार्षिक रिपोर्टों को तत्काल सार्वजनिक करने की मांग की है। साथ ही उन्होंने धारा 25 के तहत वर्षवार और विभागवार आंकड़े जारी करने, रिपोर्ट तैयार करने में हुई देरी की जांच कराने और जिम्मेदारी तय करने की बात भी रखी है।
RTI का मामला अब केवल पुरानी रिपोर्टों के प्रकाशन तक सीमित नहीं दिखता। बड़ा सवाल यह है कि आरटीआई व्यवस्था की निगरानी करने वाली संस्था की अपनी रिपोर्टिंग व्यवस्था कितनी समयबद्ध और जवाबदेह है। लंबित रिपोर्टें सार्वजनिक होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि बिहार में आरटीआई कानून के क्रियान्वयन की वास्तविक स्थिति क्या रही और देरी के लिए जिम्मेदार कौन है।









