मध्य प्रदेश में इथेनॉल के नाम पर पोषणयुक्त चावल के कथित दुरुपयोग का मामला, बिहार के पुराने चावल-धान घोटालों के बीच खाद्यान्न व्यवस्था पर फिर उठे सवाल।
पटना/भोपाल।
जिस फोर्टिफाइड (पोषणयुक्त) चावल का उद्देश्य कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों तक आवश्यक पोषण पहुंचाना था, उसी चावल के कथित दुरुपयोग ने पूरे देश को झकझोर दिया है। मध्य प्रदेश में सामने आए ₹1,160 करोड़ के कथित इथेनॉल चावल घोटाले ने सरकारी खाद्यान्न वितरण व्यवस्था, निगरानी तंत्र और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आरोप है कि इथेनॉल उत्पादन के लिए आवंटित करीब 5 लाख मीट्रिक टन फोर्टिफाइड चावल का इस्तेमाल अपने निर्धारित उद्देश्य के अनुसार नहीं हुआ। जांच एजेंसियों के अनुसार, इस मामले में सरकारी अधिकारियों, राइस मिलर्स और इथेनॉल प्लांट संचालकों की मिलीभगत की आशंका है। पुलिस ने एसआईटी गठित की है, चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, 12 ट्रक जब्त किए गए हैं और 40 से अधिक लोगों से पूछताछ चल रही है।
सबसे बड़ा सवाल – गरीबों का हक किसने छीना?
यह मामला केवल आर्थिक अनियमितता का नहीं है। यदि जांच में आरोप सही साबित होते हैं, तो यह उन लाखों बच्चों और गर्भवती महिलाओं के अधिकारों से जुड़ा मामला भी होगा, जिनके लिए सरकार विशेष रूप से फोर्टिफाइड चावल उपलब्ध कराती है ताकि एनीमिया और कुपोषण से लड़ाई मजबूत हो सके।
सरकार जिस फोर्टिफाइड चावल पर भारी खर्च करती है, उसी चावल को कथित तौर पर रियायती दर पर इथेनॉल प्लांटों को दिया गया। आरोप है कि प्लांट संचालकों ने उससे इथेनॉल बनाने के बजाय उसे राइस मिलों को बेच दिया, जहां से वही चावल फिर सरकारी व्यवस्था में वापस पहुंचा दिया गया और पूरे सिस्टम का कथित दुरुपयोग किया गया।
कैसे खुला मामला?
दरअसल बालाघाट जिले से इथेनॉल प्लांट के लिए भेजे गए सरकारी चावल से भरे ट्रकों में से एक ट्रक निर्धारित प्लांट की जगह राइस मिल में मिला। इसके बाद जांच शुरू हुई और कथित फर्जीवाड़े की परतें खुलने लगीं।
बिहार में भी क्यों बढ़ी चिंता?
मध्य प्रदेश का यह मामला बिहार में भी चर्चा का विषय बन गया है। बिहार में पहले भी धान और चावल आवंटन से जुड़े कई घोटालों की जांच हो चुकी है। दरअसल बिहार में लगभग ₹1,573 करोड़ का एक बड़ा धान घोटाला हुआ था, जिसकी जाँच सीआईडी (CID) द्वारा की गई थी। इस मामले में ऐसे राइस मिलरों को भी धान आवंटित कर दिया गया था, जिनके पास मिल मौजूद ही नहीं थी। करोड़ों रुपये के धान आवंटन घोटाले, फर्जी राइस मिलों को सरकारी धान देने के आरोप, चावल गबन के मामले और आंगनवाड़ी व मिड-डे मील खाद्यान्न वितरण में अनियमितताओं जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं।
हालांकि, फिलहाल बिहार में मध्य प्रदेश जैसी किसी नई घटना की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यदि एक राज्य में पोषण योजनाओं से जुड़ी सामग्री के दुरुपयोग की आशंका सामने आई है, तो अन्य राज्यों में भी खाद्यान्न आवंटन, परिवहन और इथेनॉल इकाइयों की स्वतंत्र ऑडिट और निगरानी की आवश्यकता है।
जनहित का मुद्दा
फोर्टिफाइड चावल किसी उद्योग के लिए नहीं, बल्कि उन परिवारों के लिए तैयार किया जाता है जो सरकारी योजनाओं पर निर्भर हैं। यदि ऐसी योजनाओं में भ्रष्टाचार या दुरुपयोग होता है, तो इसका असर सीधे गरीब परिवारों, गर्भवती महिलाओं, बच्चों और पोषण अभियान की विश्वसनीयता पर पड़ता है।
अब देशभर की निगाहें इस बात पर हैं कि मध्य प्रदेश की जांच किस निष्कर्ष पर पहुंचती है और क्या अन्य राज्यों, विशेषकर बिहार, में भी खाद्यान्न वितरण और इथेनॉल आवंटन प्रणाली का व्यापक ऑडिट कराया जाएगा।









