भोजपुर एनकाउंटर: बाढ़ पीड़ितों की आवाज उठाने वाले भरत भूषण तिवारी की मौत पर उठे सवाल

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बिहार के भोजपुर जिले में भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामला चर्चा में है। बाढ़ पीड़ितों और विस्थापित परिवारों की आवाज उठाने वाले समाजसेवी की मौत के बाद पुलिस कार्रवाई पर सवाल खड़े हो रहे हैं। जानिए पूरा मामला और विवाद की वजह।

27 February 1931 की याद फिर से ताजा हो गई जब भोजपुर जिले के शाहपुर थाना स्थित बिलौटी गांव के भरत भूषण तिवारी को पुलिस एनकाउंटर में मार दिया गया। आखिर 30 साल के मानसिक रूप से थोड़े विक्षिप्त या यूं कहे कि इस गरम दिमाग वाले नौजवान की गलती क्या थी.. की बस यह प्रशासन की गलती को सरेआम उजागर कर रहा था। 17 जून 2026 का वह सुबह बड़ा ही बेदर्द निकला जब एक समाजसेवी की पुलिस के द्वारा एनकाउंटर कर हत्या कर दी गई।

दरअसल विभाग में ऊपर के ओहदे पर बैठे लोग जब सही से काम नहीं करते हैं… तो कोई ना कोई व्यक्ति आवाज उठाने के लिए आता है। उस वक्त पढ़े-लिखे अनपढ़ साहब लोगों को जिन्हें जमीनी सच्चाई की जानकारी नहीं होती लेकिन उन्हें अपनी पढ़ाई और बुद्धिमता का घमंड होता है। और जब इन्हें सच्चाई बताई जाती है तो वह इन साहबों के अहम पर चोट जैसा लगता है। साहबों के इसी अहम ने इस नौजवान की जान ले ली।

एनकाउंटर की वजह
यहां बात साल 1931 की क्यूं की गई, यह भी बताएंगे। लेकिन इस 30 साल के नौजवान की जो विज्ञान संकाय से स्नातक का छात्र था उसकी हत्या सरकार ने क्यूं करवाई पहले ये जान लेते हैं। यह मामला 2 साल पहले का है जब गंगा में कटाव के कारण 80 परिवारों के विस्थापित किया गया था। गंगा नदी में जिन लोगों की जमीन चली गई उन्हें जहां विस्थापित किया जा रहा था, वहां की व्यवस्था सही नहीं थी और यही विस्थापन का तरीका इस समाजसेवी को नागवार गुजरा।

भरत तिवारी बाढ़ प्रभावित इलाके से थे, जहाँ बार-बार आने वाली बाढ़ ने लंबे समय से किसानों और स्थानीय समुदायों को प्रभावित किया है। वह इन मुद्दों को उठाने के लिए जाने जाते थे और खबरों के अनुसार, समाधान के लिए सरकारी अधिकारियों को कई याचिकाएँ भी दी थीं। अधिकारियों को दिए गए उनके ज्ञापनों की तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो गई हैं।

विवाद तब शुरू हुआ जब भरत तिवारी का एक फ़ेसबुक पोस्ट वायरल हुआ, जिसमें उन्होंने सरकार के कामकाज पर नाराज़गी जताई थी और कथित तौर पर एक सरकारी अधिकारी का “एनकाउंटर” करने की बात कही थी। पुलिस के अनुसार, बाद में अधिकारी उनके घर गए और उन्हें समझाने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने कथित तौर पर हथियार निकाल लिया।

आखिर भरत तिवारी सरकार से क्या चाहता था?
भरत तिवारी खुद को व्यवस्था से नाराज और बदलाव की लड़ाई लड़ने वाला व्यक्ति बताता था। उसके वीडियो और परिवार के बयानों के अनुसार वह बाढ़ प्रभावित लोगों की समस्याओं, गरीबों को सहायता, पुनर्वास और प्रशासन द्वारा किए गए वादों को पूरा करने की मांग कर रहा था। वह चाहता था कि आम लोगों की समस्याओं पर सरकार और प्रशासन गंभीरता से काम करे।

पुलिस के द्वारा एनकाउंटर के वक़्त क्या हुआ?
पुलिस के अनुसार भरत तिवारी को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया था, लेकिन उसने पुलिस टीम पर गोलीबारी की, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई की गई। वहीं परिवार और कुछ स्थानीय लोगों और खुद के द्वारा किए जा रहे फेसबुक लाइव में दिख रहा है कि उसने अपनी बंदूक पुलिस के हवाले कर दिया था। और वह आत्मसमर्पण करना चाहता था लेकिन पुलिसकर्मियों द्वारा इसके बावजूद गोली चलाई गई। इसी विरोधाभास के कारण यह एनकाउंटर विवादों में आ गया।

एनकाउंटर के बाद क्यों हुआ विरोध?
भरत तिवारी की मौत के बाद बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए और निष्पक्ष जांच की मांग की। लोगों ने सवाल उठाया कि यदि वह आत्मसमर्पण के लिए तैयार था तो फिर गोली क्यों चलाई गई। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन ने मामले में 4 पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें निलंबित कर दिया है।

27 फरवरी 1931 की याद ताजा हो गई                27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में आखिरी गोली खुद को मारकर मातृभूमि के लिए प्राण न्यौछावर कर दिए इस 24 साल के नौजवान चंद्रशेखर आजाद उर्फ तिवारी ने। वह भी अंग्रेजी शासन के क्रियाकलाप से नाराज थे। गांधी जी के असहयोग आंदोलन में उनकी पहली झलक मिली और उनके आक्रामक आंदोलन ने अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था। जिसके बाद अंग्रेजों ने चारों तरफ से उन्हें घेर लिया। लेकिन उन्होंने ये प्रण लिया था कि जीते जी वे अंग्रेजों के हाथ नहीं आयेंगे। तो खुद की गोली से उन्होंने अपनी जान ले ली।

प्रसिद्ध कवि दुष्यंत कुमार की ये पंक्तियां उस दर्द की आवाज हैं, जो व्यवस्था से निराश होकर बदलाव की मांग करती है। जब किसी व्यक्ति को लगता है कि उसकी आवाज नहीं सुनी जा रही, उसकी समस्याएं अनदेखी हो रही हैं और व्यवस्था उसके सवालों का जवाब नहीं दे रही, तब उसके भीतर एक बेचैनी जन्म लेती है। बिहार के भोजपुर के भरत भूषण तिवारी की कहानी भी कुछ ऐसी ही प्रतीत होती है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस कहानी का अंत सवालों, गोलियों और विवादों के बीच हुआ।

Sandeepak Kumar
Author: Sandeepak Kumar

संदीपक कुमार, पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 साल से अधिक का अनुभव। ई टीवी से कैरियर की शुरुआत की। महुआ, कशिश न्यूज़,न्यूज 29 जैसे चैनल में बतौर पैनल प्रोड्यूसर और पीसीआर हेड के तौर पर काम किया। रायपुर आईबीसी 24, चंडीगढ़ न्यूज 18 में सीनियर प्रोड्यूसर कार्यरत रहे। कंटेंट डिजायनर के साथ ही स्क्रिप्ट राइटिंग, पैनलिंग और डिजिटल में कार्य का भी अनुभव रहा है।

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