घाटशिला के गुड़ाबांदा में प्रशासनिक प्रक्रिया पर उठे सवाल, निष्पक्ष जांच की मांग तेज
उमेश कांत गिरि, ब्यूरो प्रभारी, घाटशिला (झारखंड)
घाटशिला: पूर्वी सिंहभूम के गुड़ाबांदा अंचल अंतर्गत कोइमा स्थित स्वर्णरेखा नदी में बालू खनन और भारी मात्रा में बालू के भंडारण को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। मामला इसलिए चर्चा में है क्योंकि जिला खनन पदाधिकारी द्वारा 8 जून 2026 को अंचलाधिकारी से भूमि की वैधानिक स्थिति सहित कई महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रतिवेदन मांगा गया था, जबकि स्थानीय स्तर पर दावा है कि इससे पहले ही बड़े पैमाने पर बालू का उठाव कर उसका स्टॉक किया जा चुका था।
जानकारी के अनुसार, कोडिया मोहनपाल एवं कोडिया मोहनपाल मौजा के लगभग 81 हेक्टेयर क्षेत्र में गोदावरी कमोडिटीज लिमिटेड को बालू उठाव का कार्य आवंटित किया गया है। वर्तमान में एनजीटी की रोक के कारण खनन कार्य बंद है, लेकिन रोक से पहले हुए खनन और बालू भंडारण की प्रक्रिया अब सवालों के घेरे में है।
स्थानीय सूत्रों के अनुसार, सीटीओ मिलने के बाद लगभग छह दिनों तक ट्रैक्टरों के माध्यम से बालू का उठाव किया गया। जिस स्थान पर बालू का विशाल स्टॉक किया गया है, वहां अब तक स्टॉक यार्ड से संबंधित कोई सूचना पट्ट नहीं लगाए जाने की भी चर्चा है।
इस बीच 8 जून 2026 को जिला खनन पदाधिकारी ने गुड़ाबांदा अंचलाधिकारी को पत्र भेजकर भूमि की प्रकृति, वन क्षेत्र की स्थिति, सार्वजनिक स्थल, सड़क, गैर-मजरूआ भूमि, संपर्क मार्ग, सरकारी आरक्षित भूमि तथा प्रस्तावित स्टोरेज यूनिट के संबंध में विस्तृत प्रतिवेदन मांगा था।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि 8 जून को संबंधित भूमि की वैधानिक स्थिति और अन्य आवश्यक तथ्यों का सत्यापन लंबित था, तो उससे पहले नदी से बड़े पैमाने पर बालू का उठाव और लाखों सीएफटी बालू का भंडारण किस वैधानिक आधार पर किया गया? क्या सभी आवश्यक स्वीकृतियां और जांच पूरी हो चुकी थीं, अथवा प्रक्रिया पूरी होने से पहले ही कार्य प्रारंभ कर दिया गया?
स्थानीय लोगों का दावा है कि नदी किनारे चार लाख सीएफटी से अधिक बालू का स्टॉक किया गया है।
हालांकि इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। वहीं, अब तक सार्वजनिक रूप से यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि एनजीटी की रोक लागू होने से पहले कुल कितना चालान जारी हुआ और अधिकृत रूप से कितना बालू स्टॉक किया गया।
खनन विभाग द्वारा मांगी गई जानकारी में प्रमुख रूप से भूमि की प्रकृति, वन क्षेत्र से संबंध, सार्वजनिक स्थलों की दूरी, कब्जे की स्थिति, संपर्क मार्ग, सरकारी उपयोग हेतु आरक्षित भूमि तथा स्टोरेज यूनिट के संबंध में अंचलाधिकारी की स्पष्ट अनुशंसा शामिल है। इससे यह प्रश्न और महत्वपूर्ण हो जाता है कि इन बिंदुओं पर प्रतिवेदन प्राप्त होने से पहले खनन और भंडारण की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ी।
अब स्थानीय लोगों की निगाहें प्रशासन और खनन विभाग की आगामी कार्रवाई पर टिकी हैं। क्षेत्र में निष्पक्ष जांच की मांग उठ रही है ताकि यह स्पष्ट हो सके कि एनजीटी की रोक से पूर्व हुए खनन और भंडारण की वास्तविक स्थिति क्या थी, सभी वैधानिक प्रक्रियाओं का पालन हुआ था या नहीं, और यदि किसी स्तर पर नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसके लिए जिम्मेदारी किसकी बनती है।
(नोट: इस रिपोर्ट में वर्णित तथ्य उपलब्ध दस्तावेजों, विभागीय पत्राचार और स्थानीय दावों पर आधारित हैं। स्थानीय लोगों द्वारा किए गए दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है। संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों एवं कंपनी का पक्ष प्राप्त होने पर उसे भी प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।)









