नई दिल्ली: केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे के बाद कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने अपने आंदोलन को समाप्त कर दिया है। सरकार ने आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों को स्वीकार कर उपज रहे राजनीतिक संकट को फिलहाल टाल दिया है, लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि केंद्र सरकार संसद मार्च के दौरान दर्ज 15 FIR भी वापस लेगी?
20 जुलाई को संसद मार्च के दौरान हुई थी हिंसा, पुलिस पर हमला और पुलिस की गाड़ी पर तोड़फोड़, आम आदमियों की संपत्ति और सरकारी संपत्ति को नुकसान तथा धार्मिक तनाव फैलाने के आरोपों के बीच दर्ज प्राथमिकी का भविष्य अब केंद्र सरकार के अगले फैसले पर निर्भर है।
हालांकि सरकार के निर्देश का इंतजार कर रही दिल्ली पुलिस का कहना है कि उसे अभी तक सरकार की ओर से एफआईआर वापस लेने का कोई आधिकारिक निर्देश नहीं मिला है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जब तक सरकार स्पष्ट आदेश नहीं देती, तब तक दर्ज मामलों की जांच नियम के अनुसार जारी रहेगी।
CJP का दावा है कि सरकार ने बातचीत के दौरान प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने का लिखित आश्वासन दिया है। हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
जानिए कैसे FIR रद्द की जा सकती है?
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार किसी एफआईआर को केवल घोषणा भर कर देने से समाप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए जो संभावित रास्ते हैं, उसके अनुसार;-
1. जांच पूरी कर चार्जशीट दाखिल कर मुकदमा आगे बढ़ाना।
2. पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने पर क्लोजर रिपोर्ट दाखिल करना।
3. सरकार द्वारा अभियोजन वापस लेने का निर्णय लेना।
यदि सरकार अभियोजन वापस लेने का फैसला करती है तो संबंधित मामलों में आगे की कार्रवाई रोक दी जा सकती है।
15 FIR, 129 जवान घायल और संजीदा मामला
संसद मार्च के वक्त हुए आंदोलन को लेकर दिल्ली पुलिस ने कुल 15 एफआईआर दर्ज किया है। जिसमें हत्या के प्रयास, दंगा, गैरकानूनी जमावड़ा, सरकारी कर्मचारियों पर हमला, सार्वजनिक और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाने सहित कई गंभीर धाराएं लगाई गई हैं। पुलिस का दावा है कि हिंसा में 129 पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि 60 प्रदर्शनकारियों को भी चोटें आईं। कई वरिष्ठ अधिकारी भी झड़प में घायल हुए।
धार्मिक उन्माद के आरोपों पर सरकार की चुप्पी
आंदोलन के दौरान मंचों से सनातन धर्म पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियां जैसे कुणाल कामरा का सीता के परी वाला बयान और धार्मिक उन्माद फैलाने की कोशिशों को लेकर भी विवाद खड़ा हुआ था। आंदोलन के दौरान एक सांप्रदायिक समुदाय द्वारा खुद को सर्वोच्च साबित करने को लेकर विपक्ष और कई सामाजिक संगठनों ने इस पर कार्रवाई की मांग की है।
अब यह देखना होगा कि यदि सरकार आंदोलनकारियों पर दर्ज मुकदमे वापस लेने का फैसला करती है, तो क्या धार्मिक भावनाएं भड़काने और हिंसा से जुड़े आरोपों पर भी वही रुख अपनाया जाएगा, या इन मामलों में अलग कानूनी प्रक्रिया जारी रहेगी।
सोशल मीडिया की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल
दिल्ली पुलिस ने बताया कि जांच में लगभग 15 टेराबाइट से अधिक वीडियो फुटेज का विश्लेषण किया गया है। शुरुआती जांच में कई सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स की भूमिका पर भी संदेह सामने आने का दावा किया गया है। पुलिस का कहना है कि संसद मार्च के दौरान अनुमान से कहीं अधिक भीड़ जुटी थी और पूरे घटनाक्रम की विस्तृत जांच की जा रही है। यह भी पता लगाने की कोशिश की जा रही है कि इसमें कितने छात्र या छात्रसंघ शामिल थे।
सबसे बड़ा सवाल
धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर सरकार ने एक तरीके से तो तत्काल राजनीतिक संकट को टाल दिया, लेकिन अब असली परीक्षा अदालतों और कानून के दायरे में दर्ज उन 15 मामलों को लेकर होगी। सरकार आंदोलनरत प्रवक्ताओं से समझौते के तहत मुकदमे वापस लेगी, या हिंसा और कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों में सख्त रुख बनाए रखेगी? आने वाले दिनों में इसी पर पूरे देश की नजर रहने वाली है।









