मोतीपुर चीनी मिल:कभी मोतीपुर की समृद्धि और रौनक हुआ करता था..

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

बिहार में 1940 तक कुल 33 चीनी मिलें स्थापित हो चुकी थीं। ये सभी निजी क्षेत्र द्वारा स्थापित चीनी मिलें थीं। जिनमें से एक मोतीपुर चीनी मिल था जिसकी स्थापना 1932 में की गई थी। इन चीनी मिलों की हालत 1975 तक खराब होने लगी थी।

बिहार के बीमार और बंद पड़े निजी चीनी मिलो को चलाने के उद्देश्य से बिहार राज्य चीनी निगम की स्थापना की गई थी। जिसने बंद और बीमार पड़ी चीनी मिलो को अपने हाथों में ले लिया। मोतीपुर चीनी भी इसी सरकारी निगम के हाथ में चल गया। और तब से 1993 तक ये चीनी मिल काम करता रहा। लेकिन इसके बाद यह मिल बंद हो गया और कामगार बेरोजगार हो गए। इसके साथ ही 1466 एकड़ क्षेत्रफल में फैला क्षेत्र बेजान हो गया और मोतीपुर की समृद्धि पर ग्रहण लग गया।

सरकार द्वारा अपने हाथ में लेने के बाद कई बार समय से कामगारों का वेतन नहीं मिला तो वे हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट के आदेश से कामगारों को वेतन मिला। वर्ष 2011 में मोतीपुर चीनी मिल को इंडियन पोटाश लिमिटेड (IPL) को लीज पर दिया था। यह समझौता 56 करोड़ रुपये में हुआ था, लेकिन बाद में मिल मालिक के वारिसों द्वारा जमीन को लेकर उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दिया। जिसके बाद विवादों के कारण यह समझौता रद्द हो गया।

अब अजीम मोतीपुर चीनी मिल के खंडहर हो चुके इस दीवारों में कई मेहनतकश जिंदगियों की जवानी बीती हैं जिसने चीनी मिल को बुलंदियों पर पहुंचाया था। इसके दीवार पर श्वेत-श्याम तस्वीरों के नीचे लिखे नाम मिट चुका है लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह मिल के मालिक और अन्य की तस्वीर हो सकती है। कमरों में मकड़ी का जाल और कुछ फाइलें धूल फांकती नजर आती है। इस परिसर में घूमते हुए आपको 65 सालों की यादें ताजा हो जाएगी अगर आप पहले कभी आए होंगे। शुगर मिल की नाम पट्टिका और “नो वेकेंसी नो एडमिशन” का बोर्ड आज भी किसी चमत्कार की आस जोह रहा है।

एक समय देश को 40 फीसदी गन्ना बिहार देता था, जो आज 10 गुणा कम होकर मात्र 4 प्रतिशत अब उपज रह गई है। आज बिहार में गन्ने की खेती दो से तीन जिलों- पश्चिम चंपारण, पूर्वी चंपारण, गोपालगंज में सिमट गई है। 2025-26 के अग्रिम अनुमान के अनुसार, गन्ने का उत्पादन 4756.14 लाख टन रहने का अनुमान है। और इससे लगभग 7 लाख टन चीनी उत्पादन की संभावना है।

गन्ना एक ऐसी फसल है जो कृषि आधारित उद्योग के लिए कई तरह का कच्चा माल उपलब्ध कराती है. साथ ही इसमें बड़ी संख्या में मजदूरों को काम मिलता है। इथाइल एल्कोहल, बगास, मड्स इसके प्रमुख सह उत्पाद है।बगास बिजली उत्पादन के अलावा प्लाईवुड, फाइबर बोर्ड बनाने के काम में आता है।  इसके मड्स से बायोफर्टिलाइजर बनता है.

आज मोतीपुर चीनी मिल परिसर झाड़-झंखाड़ से भरा एक बड़ा टीला नजर आता है। गेट पर लगे बोर्ड पर जंग लग चुका है। 2020 में इसके जमीन को बियाडा (BIADA) के अधीन कर दिया गया, जहाँ चीनी उत्पादन के बजाय एथेनॉल (Ethanol) का कारखाना लगा। लेकिन सरकारी नीति में बदलाव के कारण यहाँ के एथेनॉल प्लांट के संचालन में रुकावट और कामगारों के बेरोजगार होने की खबर मिली है। 

मोतीपुर चीनी मिल से संबंधित 95 सालों की तस्वीर आपके सामने रख दी है। बस यही समझिए कि मुजफ्फरपुर का एक नगीना को सरकारी उदासीनता ने निगल लिया है।

Sandeepak Kumar
Author: Sandeepak Kumar

संदीपक कुमार, पत्रकारिता के क्षेत्र में 20 साल से अधिक का अनुभव। ई टीवी से कैरियर की शुरुआत की। महुआ, कशिश न्यूज़,न्यूज 29 जैसे चैनल में बतौर पैनल प्रोड्यूसर और पीसीआर हेड के तौर पर काम किया। रायपुर आईबीसी 24, चंडीगढ़ न्यूज 18 में सीनियर प्रोड्यूसर कार्यरत रहे। कंटेंट डिजायनर के साथ ही स्क्रिप्ट राइटिंग, पैनलिंग और डिजिटल में कार्य का भी अनुभव रहा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

और पढ़ें