

SI ने खुद को बताया काश्तकार; DGP से EOU तक मचा हड़कंप
मुजफ्फरपुर में खाकी और अपराधी के एक ऐसे गठजोड़ का पता चला है जो साथ में मिलकर जमीन खरीदते हैं।इस मामले को लेकर सामाजिक कार्यकर्ता एवं आरटीआई एक्टिविस्ट देवव्रत कुमार साहनी ने बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP), आर्थिक अपराध इकाई (EOU), निगरानी अन्वेषण ब्यूरो, गृह विभाग और मुख्य सचिव को लिखित शिकायत भेजी है।
शिकायत में पुलिस अधिकारी और सह-क्रेता के बीच कथित आर्थिक संबंधों, संपत्ति खरीद में प्रयुक्त धन के स्रोत तथा विभागीय नियमों के अनुपालन की जांच कराने की मांग की गई है।
सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि शिकायत के अनुसार संबंधित पुलिस अधिकारी जब मुसहरी थाने में पदस्थापित थे, उसी दौरान सह-क्रेता के विरुद्ध उसी थाना क्षेत्र में रंगदारी और मारपीट समेत कई गंभीर आपराधिक मामलों में प्राथमिकी दर्ज थी। ऐसे में पुलिस अधिकारी और संबंधित व्यक्ति के बीच जमीन की संयुक्त खरीद ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।



₹3.70 लाख में खरीदी जमीन, रजिस्ट्री में दोनों के नाम
शिकायत में प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, जिला निबंधन कार्यालय मुजफ्फरपुर में विक्रय पत्र संख्या 18332/2026 में दर्ज तथ्यके तहत 1 जून 2026 को जमीन की रजिस्ट्री कराई गई। संपत्ति का विवरण इस प्रकार है:
स्थान: मौजा मैदापुर, अंचल बोचहाँ, मुजफ्फरपुर।
खाता संख्या: 229
खेसरा संख्या: 357
कुल रकबा: 4.5 डिसमिल।
रजिस्ट्री मूल्य: ₹3,70,000।
निबंधन तिथि: 1 जून 2026।
विक्रय पत्र में संयुक्त खरीदार के रूप में सोनू पाठक और अवर निरीक्षक तेज प्रकाश सिंह का नाम दर्ज होने की बात कही गई है। यहां एक और बात आश्चर्य रूप से उभरा है कि सोनू पाठक, पिता उमेश पाठक का नाम कहीं कहीं सोनुपाठक उर्फ राजीव रंजन पाठक, पिया उमेश पाठक भी दर्ज है। लेकिन जब जमीन का निबंधन हुआ तो क्रेता के रूप में सोनू पाठक ही दर्ज है।
शिकायतकर्ता का सवाल है कि एक सेवारत पुलिस अधिकारी ने अपने पूर्व कार्यक्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से जमीन खरीदने का निर्णय क्यों लिया, जिसके विरुद्ध उसी क्षेत्र में कई आपराधिक मामले दर्ज बताए जा रहे हैं?
सह-क्रेता पर रंगदारी और मारपीट के मामले दर्ज!
शिकायत में सोनू पाठक के विरुद्ध मुसहरी और मिठनपुरा थानों में दर्ज तीन मामलों का उल्लेख किया गया है।
थाना कांड संख्या शिकायत में उल्लिखित आरोप

इन मामलों की वर्तमान न्यायिक स्थिति और संबंधित व्यक्ति की भूमिका की स्वतंत्र पुष्टि अभी आवश्यक है।
हालांकि, इन मामलों का उल्लेख करते हुए शिकायतकर्ता ने पुलिस अधिकारी और सह-क्रेता के बीच संपत्ति खरीद को लेकर संभावित हितों के टकराव की जांच कराने की मांग की है।
जमीन खरीदने के लिए पुलिस अधिकारी बना ‘काश्तकार’
इस पूरे मामले में दूसरा महत्वपूर्ण पहलू विक्रय पत्र में दर्ज पेशे का विवरण है। शिकायतकर्ता के अनुसार, निबंधित विक्रय पत्र में अवर निरीक्षक तेज प्रकाश सिंह का पेशा ‘काश्तकारी’ दर्ज है, जबकि वह बिहार पुलिस में सेवारत अधिकारी बताए गए हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि रजिस्ट्री के दौरान पेशे का यही विवरण किस आधार पर दर्ज कराया गया? क्या यह सामान्य दस्तावेजी त्रुटि है या फिर वास्तविक पेशे और सरकारी पद की जानकारी छिपाई गई? इसकी पुष्टि के लिए निबंधन कार्यालय के मूल अभिलेख, प्रस्तुत पहचान पत्र और संबंधित अधिकारी के विभागीय रिकॉर्ड की जांच जरूरी है।
सरकारी सेवक आचार नियमावली के उल्लंघन की आशंका
शिकायतकर्ता ने बिहार सरकारी सेवक आचार नियमावली, 1976 के नियम 19 का हवाला देते हुए विभागीय जांच की मांग की है। उनका कहना है कि सरकारी सेवक द्वारा अचल संपत्ति अर्जित करने के दौरान निर्धारित विभागीय प्रक्रिया और सक्षम प्राधिकारी को सूचना देने संबंधी नियमों का पालन किया जाना चाहिए।
मुसहरी थाना की केस डायरी की समीक्षा की मांग
शिकायत में मुसहरी थाना कांड संख्या 228/2024 और 238/2024 को विशेष रूप से जांच के दायरे में लाने की मांग की गई है। शिकायतकर्ता का कहना है कि संबंधित अधिकारी के पूर्व पदस्थापन की अवधि, इन मामलों में उनकी भूमिका, केस डायरी, पर्यवेक्षण रिपोर्ट और अनुसंधान की प्रक्रिया की वरिष्ठ अधिकारियों से समीक्षा कराई जाए।
साथ ही यह भी जांच करने की मांग की गई है कि कहीं संपत्ति खरीद और पूर्व में दर्ज आपराधिक मामलों के बीच कोई आर्थिक या अन्य संबंध तो नहीं है।
फिलहाल किसी प्रकार के लेन-देन को रिश्वत या अपराध से अर्जित आय साबित करने वाला स्वतंत्र साक्ष्य अब तक सामने नहीं आया है।
EOU और निगरानी विभाग से जांच की मांग
देवव्रत कुमार साहनी ने अपनी शिकायत में आर्थिक अपराध इकाई (EOU) अथवा निगरानी अन्वेषण ब्यूरो से पूरे मामले की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की है।
शिकायत में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, बेनामी संपत्ति लेनदेन निषेध अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता के प्रासंगिक प्रावधानों के तहत जांच की मांग भी शामिल है।
हालांकि, केवल किसी आपराधिक मामले के आरोपी के साथ संयुक्त रूप से जमीन खरीदना अपने आप में भ्रष्टाचार या बेनामी लेनदेन साबित नहीं करता। इसके लिए धन के वास्तविक स्रोत, भुगतान की परिस्थितियों और लाभार्थी की भूमिका की जांच आवश्यक होगी।
DGP से लेकर मुख्य सचिव तक पहुंचा मामला
शिकायतकर्ता ने बिहार पुलिस महानिदेशक, आर्थिक अपराध इकाई, निगरानी विभाग, गृह विभाग और मुख्य सचिव से हस्तक्षेप की मांग की है।इसके अलावा मुजफ्फरपुर के जिलाधिकारी और वरीय पुलिस अधीक्षक को भी शिकायत की प्रतिलिपि भेजे जाने का उल्लेख किया गया है।
शिकायत में प्रमुख रूप से चार मांगें रखी गई हैं:
SI तेज प्रकाश सिंह के विरुद्ध निष्पक्ष विभागीय जांच।
जांच के दौरान आवश्यकतानुसार निलंबन और अनुशासनात्मक कार्रवाई पर विचार।
जमीन खरीद में प्रयुक्त धन के स्रोत की आर्थिक जांच।
मुसहरी थाना के संबंधित कांडों की केस डायरी और अनुसंधान की समीक्षा।
पुलिस की निष्पक्षता पर उठे सवाल
इस पूरे प्रकरण ने पुलिस महकमे की जवाबदेही और पारदर्शिता को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि कोई पुलिस अधिकारी अपने पूर्व कार्यक्षेत्र के ऐसे व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदता है, जिसके विरुद्ध उसी क्षेत्र में आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, तो इस संबंध की परिस्थितियों की जांच होना स्वाभाविक है।
क्या संबंधित अधिकारी ने संपत्ति खरीद की जानकारी विभाग को दी थी? क्या जमीन खरीद में दोनों की वास्तविक आर्थिक हिस्सेदारी थी? क्या पूर्व पदस्थापन के दौरान दर्ज मामलों पर इस संबंध का कोई प्रभाव पड़ा?
इन सभी सवालों का जवाब दस्तावेज आधारित और निष्पक्ष जांच से ही सामने आ सकता है।
अब निगाहें बिहार पुलिस मुख्यालय, EOU और निगरानी विभाग पर टिकी हैं। देखना होगा कि इस शिकायत पर विभाग क्या संज्ञान लेता है और क्या इस मामले में उच्चस्तरीय जांच के आदेश दिए जाते हैं।








