
भारत सरकार ने 10 साल बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात की दी मंजूरी
नई दिल्ली: देश में चीनी की बढ़ती कीमतों के बीच एथनॉल उत्पादन को लेकर बहस तेज हो गई है। कुछ विपक्षी दलों की ओर से दावा किया जा रहा है कि पेट्रोल में एथनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति के कारण गन्ने और चीनी का एक हिस्सा एथनॉल उत्पादन में जाने लगा, जिससे बाजार में चीनी की उपलब्धता प्रभावित हुई और कीमतें बढ़ीं।
हालांकि, केंद्र सरकार ने इस दावे को खारिज किया है। लेकिन सरकार की नीति ने चीनी के दाम को कैसे प्रभावित किया यह भी बताएंगे। सरकार के अनुसार, मौजूदा समय में चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी के लिए एथनॉल उत्पादन को सीधे जिम्मेदार ठहराना सही नहीं है। सरकार ने उत्पादन, मांग, मौसम और वैश्विक बाजार की स्थिति को कीमतों में तेजी के प्रमुख कारणों में शामिल किया है।
एथनॉल को सरकार ने क्यों नहीं माना जिम्मेदार?
केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार, एथनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल होने वाली चीनी का हिस्सा 2022-23 में करीब 12 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 प्रतिशत रह गया है। सरकार का यह भी कहना है कि देश में बनने वाले एथनॉल का करीब तीन-चौथाई हिस्सा अब अनाज, विशेषकर मक्का, से तैयार होता है।
चीनी महंगी होने के पीछे का क्या कारण ?
सरकार के अनुसार, चीनी की मौजूदा कीमतों में तेजी के पीछे कई कारण हैं। इनमें अनुमान से कम घरेलू उत्पादन, त्योहारों से पहले बढ़ती मांग, मौसम संबंधी समस्याएं और गन्ने की फसल को हुए नुकसान को प्रमुख वजह माना जा रहा है।
इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीनी की आपूर्ति और कीमतों में बदलाव का असर भी भारतीय बाजार पर पड़ा है। सरकार ने बाजार में कुछ स्तर पर जमाखोरी और सट्टेबाजी की शिकायतों को भी कीमतों में अस्थिरता से जोड़ा है।
सरकार की वह नीति जिसने मिठास किया महंगा! दरअसल, भारत सरकार ने एथेनॉल उत्पादन में लगभग 31 लाख टन (गन्ने के रस/शीरे से एथेनॉल बनाने में) कुल उत्पादन का इस्तेमाल किया। इसके अलावा लगभग 20 लाख टन निर्यात का आदेश दिया। लेकिन विश्व में चीनी की कीमत नहीं होने के कारण लगभग 8 लाख टन चीनी का ही निर्यात हो सका। एक और अन्य वजह यह भी रहा कि देश का क्लोजिंग स्टॉक घटकर करीब 35 से 40 लाख टन रहने का अनुमान लगाया गया है, जबकि सुरक्षित बाजार संचालन के लिए आदर्श रूप से 60 लाख टन स्टॉक होना चाहिए।
खुदरा बाजार में भी बढ़ी कीमत
चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का असर खुदरा बाजार में भी दिखाई दे रहा है। उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 20 अगस्त 2026 को खुदरा बाजार में चीनी की औसत कीमत करीब 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम थी। एक महीने पहले यह कीमत करीब 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम और 20 अगस्त 2025 को करीब 46.30 रुपये प्रति किलोग्राम थी।
अक्टूबर से राहत मिलने की उम्मीद
चीनी बाजार से जुड़े जानकारों के मुताबिक जुलाई से सितंबर के बीच चीनी उत्पादन लगभग न के बराबर होता है। इसी अवधि में त्योहारों के कारण मांग भी बढ़ती है। नई चीनी का उत्पादन अक्टूबर से शुरू होने के बाद बाजार में आपूर्ति बढ़ने की उम्मीद है। इससे कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। हालांकि, वास्तविक राहत उत्पादन, मांग और बाजार में उपलब्ध स्टॉक पर निर्भर करेगी।
सरकार ने उठाए जरूरी कदम
त्योहारी सीजन से पहले बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए केंद्र सरकार ने चीनी के निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया हैं। इसके अलावा थोक कारोबारियों के पास चीनी के स्टॉक की भी सीमा तय कर दी गई है। इसके अलावा सरकार ने 10 साल बाद 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को मंजूरी दी है। 2015 में चीनी का आयात किया गया था लेकिन उसके बाद देश चीनी उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर हो गया था। 2021-22 के बाद सरकार की तरफ से चीनी मिलों की सब्सिडी भी घोषित नहीं की गई थी।
सरकार का कहना है कि घरेलू खपत के लिए देश में पर्याप्त चीनी उपलब्ध है और बाजार में कृत्रिम कमी पैदा करने वाली गतिविधियों पर नजर रखी जा रही है।
एथनॉल और चीनी की कीमतों का संबंध?
एथनॉल बनाने को लेकर चीनी का उससे संबंध पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि गन्ने और उससे जुड़े उत्पादों से एथनॉल का उत्पादन होता है। हालांकि, मौजूदा कीमतों में तेजी का पूरा कारण एथनॉल उत्पादन के साथ साथ सरकार की निर्यात नीति को भी मानना होगा। वैसे इस बात पर संतोष जताया जा सकता है कि अक्टूबर से गन्ना पेराई के सीजन शुरू होने के बाद कीमतों में कुछ कमी आए।










