मुजफ्फरपुर में स्मार्ट सिटी परियोजना फेल? करोड़ों खर्च के बाद भी नहीं दिखा बदलाव

मैं मुजफ्फरपुर हूं मेरी पहचान 2018 की नहीं है जब मुझे स्मार्ट सिटी के तौर पर नवाजा गया गया। बल्कि मेरी पहचान 1875 की है जब ब्रिटिश शासनकाल में मुजफ्फर खान के नाम पर बसाया गया था। मेरी पहचान खुदीराम बोस से भी जुड़ा है जब जिला मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड पर बम फेंका गया था। इतना ही नहीं बल्कि मेरी पहचान शाही लीची से भी जुड़ा है जिसकी मिठास दुनिया के कोने तक फैला है।
मेरी स्थिति सुधारने का काम साल 2018 में शुरू हुआ जब मुझे स्मार्ट सिटी का दर्जा मिला। केंद्र में नरेंद्र मोदी सत्तासीन थे। 2600 करोड़ रुपए से मुझे स्वक्ष और मेरा जीर्णोद्धार कार्यक्रम शुरू हुआ। आज 8 साल बीत चुके हैं लेकिन मैं वैसे का वैसा ही हूं। शासन, सत्ता सब बदले, पर जो नहीं बदली वो मेरी तकदीर है। जिनके प्रयास से मुझे स्मार्ट सिटी का दर्जा मिला उनकी सत्ता 2020 में चली गई। उसके बाद कांग्रेस के विजेंद्र चौधरी के 5 साल के कार्यकाल में मुझे एक तरीके से काल कोठरी में डाल दिया गया। मैं उस अंधेरे कोठरी से अपने जीर्णोद्धार के धीमी कार्य को देख रहा था। पर संतोष था कि धीमे ही सही पर मुझे बेहतर बनाने का कार्य चल तो रहा था।
लेकिन एकाएक 2024 से मुझे बदलने का कार्य बंद हो गया। सारी व्यवस्था ठप्प हो गई और मुझे खूबसूरत बनाने के कार्य पर ब्रेक लग गया। मेरे हृदय को छलनी कर सीवर लाइन का काम हुआ, संतोष था कि मैं शहर की गंदगी को साफ करूंगा। लेकिन मुझे जब शहर की गंदगी को हटाने के लिए खोला गया तो शासन के बही खाते में मुझे जाम दिखाया गया।
शहर पर नजर रखने को लेकर जगह जगह सड़कों पर कैमरे लगाए गए। जिसमें कहा गया था कि शहर की सड़कों पर हो रहे हर गतिविधि को मेरे द्वारा नजर रखी जाएगी। लेकिन मैं बस यातायात विभाग के लिए चालान काटने भर के लिए रह गया।
2025 में मुजफ्फरपुर की जनता ने MLA की सीट फिर से बीजेपी के झोले में डाल दी। मुझे भी लगा कि फिर से मेरे रौनक को बढ़ाने का कार्य किया जाएगा। लेकिन 6 महीने बीत गए विधायक जी को, इन्होंने मेरे लिए अब तक कुछ भी नहीं किया। इन्होंने इन 6 महीनों में एक बार भी मेरे लिए या मुजफ्फरपुर की जनता के लिए सदन में बात तक नहीं उठाई।
इसी बीच चुनावी रंजिश के नाम पर मुकुंद कुमार से नगर विधायक रंजन कुमार की लड़ाई हो जाती है। रंजन कुमार का कहना था कि मुकुंद कुमार द्वारा उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर पोस्ट कर अमर्यादित टिप्पणी की जा रही थी, जिसमें वह मुकुंद कुमार को समझाने गए थे। लेकिन समय ने कुछ और ही चाल चल रखी थी। समझाने के क्रम में बात इतनी बढ़ गई कि विधायक आपे से बाहर हो गए, और मुकुंद कुमार के साथ मारपीट कर ली। इसको लेकर मुकुंद कुमार की पत्नी पिंकी कुमारी ने मिठनपुरा थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई है।
अब वापस मुजफ्फरपुर की तरफ रुख कर रहा हूं। इसमें सबसे पहले मुजफ्फरपुर की आस्था गरीबनाथ मंदिर, देवी मंदिर और बंगलामुखी मंदिर की व्यवस्था पर नजर डालें तो सबसे गरीब गरीब नाथ मंदिर ही नजर आता है। शहर के बीचोबीच स्थित इस मंदिर तक पहुंचने की व्यवस्था बहुत संकरी है। सावन के महीने में सोमवार का दिन सबसे पवित्र माना जाता है। उस दिन मुजफ्फरपुर के आधे शहर का हाल सबसे दयनीय हो जाता है और शहर दो भागों में बट जाता है।
संकरे रास्ते ही मुजफ्फरपुर की पहचान है। या यूं कहिए कि मुजफ्फरपुर की परिकल्पना दिल्ली के चांदनी चौक से कर सकते हैं। नालियों से बजबजाती गलियां और ऊबर खाबड़ टूटे गढ़ों वाले रास्ते ही मुजफ्फरपुर की पहचान है। स्मार्ट सिटी की घोषणा के बाद संभावना थी कि शहर की कुछ पहचान बदलेगी। लेकिन नगर विधायक, शहर सरकार और जिले के प्रथम नागरिक में विजन की स्पष्ट कमी की वजह से शहर का विकास जैस थम सा गया है। वैसे मीडिया की लाइमलाइट में रहना सबको अच्छा लगता है।










